scriptmaharaja library in jaipur | महाराजा लाईब्रेरी: देख सकते हैं अकबर की लिखवाई महाभारत | Patrika News

महाराजा लाईब्रेरी: देख सकते हैं अकबर की लिखवाई महाभारत

जयपुर की महाराजा लाईब्रेरी दो सदी का इतिहास समेटे हुए है।

जयपुर

Updated: January 16, 2015 12:04:38 pm

जयपुर। कहते हैं कि टीवी और इंटरनेट के जमाने में लोगों के पास इतना समय नहीं होता कि वे समय निकाल कर कुछ पढ़ सकें, लेकिन ऎसा नहीं है। लोग अब भी अपनी भागदौड़ भरी जिंदगी के बावजूद पढ़ने का समय निकाल लेते हैं।

ऎसी ही एक जगह है, जयपुर के चौड़ा रास्ता स्थित महाराजा लाईब्रेरी। जहां रोजाना सैकड़ों की तादाद में लोग पढ़ने आते हैं। यहां प्रतिदिन आने वाले बहुत से लोग तो ऎसे भी हैं जो करीब पचास साल से यहां आ रहे हैं।

कब हुई लाईब्रेरी की स्थापना
लाईब्रेरी में कार्यरत स्टाफ के मुताबिक लाईब्रेरी की स्थापना आमेर के राजा और मुगल सम्राट अकबर के नौ रत्नों में से एक महाराजा मान सिंह ने सन 1652 में आमेर में की थी। तब ये केवल राजघराने के लोगों के लिए ही थी। इसके बाद सन 1704 में सवाई जयसिंह ने इसके विकास में योगदान दिया और इसमें 420 ग्रंथ रखवाए। सन1716 में इसे आमेर से जयपुर के जलेब चौक में स्थानांतरित किया गया।

इसके बाद महाराजा रामसिंह ने 1886 में इसे राजघराने के निजी दायरे से बाहर निकाल कर चौड़ा रास्ता में एक विशाल भवन बनाकर उसमें शिफ्ट कर दिया और इसे सार्वजनिक पुस्तकाल का स्वरूप दिया। तब से लेकर आज यह लाईब्रेरी यहीं पर संचालित हैं। इस भवन में बड़े-बड़े 10 हॉल हैं।

देश आजाद होने और रियासतों का राज खत्म होने के बाद इस लाईब्रेरी का संचालन सन 2000 तक शिक्षा विभाग करता आया था। फिर 2002 में भाषा एवं पुस्तकालय विभाग का गठन होने के बाद यह लाईब्रेरी इसी विभाग के अधीन है।

विख्यात विद्वानों ने किया संचालन
लाईब्रेरी में मौजूद रिकॉर्ड के मुताबिक इस लाईब्रेरी के पहले ग्रंथपाल फ्रैंक अलैक्जेंडर थे। इसके बाद हरजीवन घूराट, महिमचंद्र सेन, प्रफुल्ल चंद्र चटर्जी जैसे विद्वानों ने यहां अपनी सेेवाएं देकर इसे और समृद्ध बनाया।

लाईब्रेरी में हैं सवा लाख पुस्तकें
इस पुस्तकालय में सवा लाख से भी ज्यादा किताबें मौजूद हैं जो हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी और उर्दू में हैं। उर्दू की कुछ किताबें यहां से टोंक के अरबी-फारसी शोध संस्थान में तथा कुछ किताबें जयपुर के सिटी पैलेस भेजी गई हैं, तो कुछ किताबें वहां से यहां आई हैं।

दुर्लभ ग्रंथ और पांडूलिपियां भी मौजूद
लाईब्रेरी में 108 दुर्लभ पुस्तकें हैं और 330 हस्तलिखित पांडूलिपियां हैं, जो आज भी सुरक्षित हैं। ये पांडूलिपियां संस्कृत भाषा में हैं, इनमें दर्शन शास्त्र, रसायन शास्त्र,चिकित्सा विज्ञान और कुछ साहित्य भी हैं।

बताया जाता है कि इनमें कई पांडूलिपियां तो महर्षि चरक के जमाने की है। इसके अलावा कुछ खास पांडूलिपियां भी हैं जिनमें सिद्धांत कौमदी पूर्वाद्ध,ज्योतिष रत्न माला, रस मंजूरीव संग्रहणी, संक्षेप भुवन हैं। इसके अलावा कवि माघ द्वारा रचित सटीक सप्तम भी यहां संग्रहित है।

दुर्लभ ग्रंथों में जयपुर एलबम, जयपुर पोर्टफोलियो, भागवत गाथा का उर्दू में अनुवाद, अकबर द्वारा कराया गया गया महाभारत का फारसी अनुवाद "रज्जनामा", पुरातत्व विभग से संबंधित कर्निघम रिपोर्ट, दो सौ साल से भी अधिक पुरानी भृगुसंहिता इस लाईब्रेरी में आज भी सुरक्षित है।

इसके अलावा सन 1876 में प्रकाशित समाचार पत्र गजट ऑफ इंडिया, पायनियर, लंदन न्यूज जैसे दुर्लभ समाचार पत्रों की प्रतियां भी यहां मौजूद हैं।

नन्हें पाठकों के लिए बालकक्ष
महाराजा लाईब्रेरी में नन्हें मुन्ने पाठकों के लिए भी खास प्रबंध है। यहां सन 1944 से ही अलग बालकक्ष की स्थापना की हुई है। इसमें 15 साल तक के बच्चों को उनकी रूचित की पुस्तकें, चित्र, ज्ञानवर्घक रोचक साहित्य उपलब्ध कराया जाता है।

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