
ईस्वी 232 वर्ष पूर्व सम्राट अशोक द्वारा इंसानों को जीवन जीने की सीख देने के लिए शिलालेख लिखवाए गए.
कटनी. सम्राट अशोक द्वारा ईश्वी 232 पूर्व शिलालेख के माध्यम से इंसानों को इंसानियत की सीख देती शिलालेख हो या दसवीं शताब्दी में कल्चुरी कॉलीन राजाओं की नगरी बिलहरी में कामकंदला किला से लेकर पुरातात्विक महत्व का विजयराघवगढ़ के कारीतलाई स्थित भगवान विष्णुवराह मंदिर। कटनी जिले में ऐसे कई एतिहासिक धरोहर हैं जो पर्यटन के क्षेत्र में जिले को देश के नक्शे पर प्रमुख स्थान पर ला सकती हैं। दरकार है इन स्थानों को चिन्हित कर टूरिस्ट सर्किट के रूप में विकसित करने की। जिससे सैकड़ों युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर तैयार हो सके।
इस बारे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के मंडल कार्यालय जबलपुर के सुपरिटेंडेंट ऑर्कियोलाजिस्ट डॉ. शिवाकांत वाजपेयी बताते हैं कि कटनी जिले में पुरातत्व महत्व की कई एतिहासिक धरोहर है। रूपनाथ मंदिर स्थित सम्राट अशोक के संदेश देती शिलालेख तो इस स्थान को दुनियाभर के चुनिंदा स्थानों पर ला खड़ा करती है। बिलहरी की किला हो या कारीतलाई स्थित पुरातत्व महत्व की धरोहर। सभी स्थानों पर अब हम संरक्षित करने की ओर आगे बढ़ रहे हैं। पहले चरण में जर्जर स्थानों को संरक्षित किया जाएगा और दूसरे चरण में दुर्लभ मूर्तियों को उचित स्थान पर संरक्षित किया जाएगा। कुछ दिन पहले हमारी बात कलेक्टर प्रियंक मिश्रा से हुई थी। जल्द ही इस दिशा में बेहतर काम होगा।
कटनी जिले के बहोरीबंद के समीप इस्वी 232 वर्ष पूर्व सम्राट अशोक द्वारा इंसानों को जीवन जीने की सीख देने के लिए शिलालेख लिखवाए गए। दुनियाभर में ऐसे 40 शिलालेख मिले हैं। इनमें से एक कटनी जिले के बहोरीबंद के रुपनाथ धाम में है। इसमें बौद्ध धर्म की बारीकियों पर कम और मनुष्यों को आदर्श जीवन जीने की सीखें अधिक मिलती हैं। शिलालेखों में सम्राट अपने आप को "प्रियदर्शी" (प्राकृत में "पियदस्सी") और देवानाम्प्रिय (यानि देवों को प्रिय, प्राकृत में "देवानम्पिय") की उपाधि से बुलाते हैं।
इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण को लेकर बहोरीबंद के सेवानिवृत्त प्राचार्य वायके श्रीवास्तव बताते हैं कि सम्राट अशोक द्वारा दुनियाभर में इंसानियत को सही राह पर ले जाने के लिए ईश्वी 232 वर्ष पूर्व लिखवाए गए शिलालेखों में से एक रुपनाथ धाम में है। यह हमारी अमूल्य धरोहर है। आज की युवा पीढ़ी इसे जानकर गौरवान्वित होगी, लेकिन दुर्भाग्य है कि स्थानीय प्रशासन द्वारा ऐसे धरोहरों के संरक्षण को लेकर किए जाने वाले प्रयास नाकाफी हैं।
प्रेम के प्रतीक के रूप में विख्यात कामकंदला
जिला मुख्यालय से 16 किलोमीटर दूर बिलहरी नगरी को लेकर जनचर्चा है कि यह नगरी कभी राजा कर्ण की राजधानी थी। यहां कल्चुरी कॉलीन दसवीं शताब्दी का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है जिसे कल्चुरी कॉलीन युवराज द्वितीय 980-990 ई. से संबंधित बताया जाता है। अभिलेख से कल्चुरी वंश की उत्पत्ति और शासकों के बारे में जानकारी मिलती है। साथ ही युवराज प्रथम 915-940 के बारे में भी जानकारी मिलती है। यहां एतिहासिक किले से कुछ दूरी पर स्थित कामकंदला स्तंभ को प्रेम का प्रतीक बताया जा रहा है।
अगर इसके संरक्षण की बात करें तो पुरातात्विक धरोहर संरक्षण के अभाव में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। कई घरों में तो एतिहासिक पत्थर के खंभे से लोगों के घरों की बाउंड्रीवाल तक खड़ी की गई है। दुर्लभ मूर्तियां बिखरी पड़ी है। मरम्मत मे अभाव में एतिहासिक किला जर्जर अवस्था में है।
विष्णुवराह मंदिर में खजुराहो की तरह कलाकृतियां
खजुराहो की कलाकृतियों की तरह कटनी जिले के विजयराघवगढ़ विकासखंड के कारीतलाई में विष्णु वराह मंदिर भव्यता के साथ पुरातात्तिवक महत्व लिए हुए है। यहां 493 ईस्वी के अवशेष विद्यमान हैं। भगवान गणेश, विष्णु-वाराह, शिव-पार्वती की प्रतिमाएं, गोड़ों की प्राचनी बस्ती, विस्तीर्ण तालाब, प्राचीन पाठशाला, स्मारक, संग्रहालय है। यहां खुदाई में मिले शिलालेख रायपुर संग्राहालय, रानीदुर्गावती संग्राहालय जबलपुर व ग्वालियर में संरक्षित हैं।
स्थानीय युवा संदेश उपाध्याय बताते हैं कि कारीतलाई का यह स्थान देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शुमार हो सकता है। यहां कल्चुरी कॉलीन अवशेषों के साथ ही जमीन के अंदर अमूल्य विरासत दबी हुई है। कुछ वर्ष पहले खुदाई में एक बावली मिली थी। यहां आसपास मूर्तियां बिखरी पड़ी है। कुछ मूर्तियों को कक्ष के अंदर रखा गया जिसे लोगों के देखने के लिए बाहर रखा जाना चाहिए। संरक्षण के अभाव में लोग पत्थरों को ले जा रहे हैं।
संरक्षण जरूरी
- बिलहरी में एतिहासिक धरोहर अतिक्रमण की चपेट में है। किला तक पहुंचने के लिए अच्छी सड़क भी नहीं है।
- रुपनाथ धाम में सम्राट अशोक के संदेश की जानकारी आसपास के लोगों को ही नहीं है। जिला मुख्यालय में भी सूचना का अभाव।
- नेशनल हाइवे में पर्यटन महत्व बताने संबंधी सूचना बोर्ड का अभाव है। लोगों को जानकारी नहीं मिलती।
- जिला प्रशासन को ऐसे स्थान का विकास भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की मदद से करनी चाहिए, लेकिन ऐसे प्रयास भी नाकाफी रहे हैं।
Published on:
30 Jan 2022 12:06 am
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