
दोनों आंखों से दिव्यांग बेटी ने दिलाया स्वर्णपदक, तंग हालत से टूट रहा हौंसला
कटनी. मां गृहिणी हैं, घर में 3 भाई और दो बहनें, पिता मजदूरी करके घर चला रहे थे, परिवार का किसी तरह भरण-पोषण कर रहे थे, अचानक स्वास्थ्य खराब होने के कारण मजदूरी छूटी और दिन ब दिन खराब हो रही आर्थिक स्थिति, आखों से नहीं दिखने की समस्या में इलाज के लिए पैसे की किल्लत, गांव से सिहोरा पहुंचकर कॉलेज की पढ़ाई के लिए रोज-रोज का खर्च उठाना, पढ़ाई और कोचिंग के लिए किराए का भी इंतजाम नहीं हो पा रहा है...। बेटी नियमित कॉलेज भी नहीं जा पा रही। यह दयनीय दशा है 2017 में गुडग़ांव दिल्ली में आयोजित पांचवें राष्ट्रीय जूडो प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक, 2018 में राष्ट्रीय ब्लाइंड जूडो में कांस्य पदक व 2021 में लखनऊ में आयोजित ब्लाइंड जूडो प्रतियोगिता में कांस्य पदक सहित देश के अलग-अलग शहरों में आयोजित दूसरी प्रतियोगिताओं में कई मैडल दिलाने वाली होनहार बेटी ढीमरखेड़ा क्षेत्र के ग्राम दशरमन निवासी दिव्यांग सुदामा चक्रवर्ती की।
तमाम चुनौतियों से लड़ते हुए लक्ष्य तक पहुंचने वाली बेटी की कहानी आर्थिक बोझ के चलते अब आगे बढऩे की डगर कठिन हो रही है। बचपन से प्रगति पथ पर आगे बढ़ रही बेटी जिसने हजारों को जीने की राह दिखा रही हैं, लेकिन हौंसला आर्थिक चुनौती से टूट रहा है। होनहार बेटी पढ़ लिखकर आइएएस ऑफिस बनकर देश सेवा करना चाहती है, लेकिन ऐसी बेटी की समस्याओं पर प्रशासनिक अफसरों और जनप्रतिनिधियों की नजर इनायतें नहीं हो रही हैं। बेटी सुदामा के जज्बे को सम्मान देने लिए 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर तत्कालीन कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने एक दिन के लिए कटनी का सांकेतिक कलेक्टर बनाया, लेकिन लौटकर उसकी अब कोई सुध नहीं ले रहा।
पढ़ाई के साथ पै्रक्टिस
सुदामा चक्रवर्ती कक्षा बीए फाइनल इयर की छात्रा हैं। श्याम सुंदर अग्रवाल कॉलेज सिहोरा पढ़ाई करते हुए कटनी से कम्प्यूटर कोर्स भी कर रही हैं। 70 किलोमीटर सेंटर दूर होने के कारण अब प्रैक्टिस नहीं हो पा रही है। सुदामा ने कहा कि दिसंबर के लास्ट में जम्मू काश्मीर में टूर्नामेंट होने वाला है वहां जाने के लिए तैयारी की जा रही है, लेकिन प्रैक्टिस रुकने से समस्या होगी। बेटी ने कहा कि 5 हजार रुपए कॉलेज के माध्यम गांव की बेटी योजना के तहत, पोस्ट मैट्रिक के तहत 5 हजार रुपए वार्षिक सहायता व 600 रुपए पेंशन के मिल रहे हैं जो नाकाफी हैं। सुदामा ने कहा कि कक्षा पहली कक्षा में जब भाई के साथ प्रवेश लेने गईं तो शिक्षक ने यह कहकर लौटा दिया कि देख नहीं पाती तो पढ़ेगी कैसे, फिर भी पढऩे की जिद नहीं छोड़ी और अब लोगों के लिए मिसाल बन गई हैं।
जर्मनी में बन रही फिल्म
जर्मनी में होनहार बेटी सुदामा पर 'आजादी फिल्मÓ बन रही है। इसमें दिव्यांग बेटियों को घर वाले आगे पढ़ाने के लिए राजी नहीं रहते, लेकिन सुदामा के माता-पिता ने बाहर भेजा, जिसपर मोटीवेशनल फिल्म बन रही है। जर्मनी से फरवरी माह माह में फिर टीम सूटिंग के लिए कटनी पहुंचेगी और सुदामा पर बन रही फिल्म की सूटिंग पूरी करेगी।
एक लैपटॉप के लिए मोहताज बेटी
सुदामा ने रूंधे हुए गले से बताया कि दो साल से लैपटॉप के लिए प्रयास कर रही है। सामाजिक न्याय विभाग से आवेदन दिया, लेकिन उसे जबलपुर जिला स्थानांतरित कर दिया गया। कई बार अधिकारियों से मदद की गुहार लगाई। यह प्रक्रिया तीन माह में पूरी हो जानी चाहिए, लेकिन एक साल बाद भी कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
यह है सुदामा को मलाल
जूड़ो में स्वर्णपदक दिलाने वाली दिव्यांग बेटी सुदामा कई बार खेल में बेहतर प्रदर्शन करने अपने हुरन का लोहा मनवा चुकी हैं। प्रतिभा को सम्मान भी मिला, लेकिन बेटी को आर्थिक प्रोत्साहन न मिलने का भी मलाल है। सुदामा ने कहा कि टूर्नामेंट में जाते हैं तो हम सुनते हैं कि हरियाणा, पंजाब सहित कई राज्यों से हर राज्य के खिलाड़ी आते हैं। जिनको गोल्ड मेडल मिलता है उन्हें दो से तीन लाख रुपए प्रोत्साहन राशि मिलती है, लेकिन मध्यप्रदेश में यह व्यवस्था नहीं है। कम से कम दिव्यांग खिलाडिय़ों के लिए तो व्यवस्था होनी चाहिए। प्रशासन द्वारा भी कोई मदद नहीं मिल रही। जनप्रतिनिधि भी ध्यान नहीं दे रहे।
पिता अस्वस्थ, कैसे चलेगी पढ़ाई
बेटी सुदामा ने कहा कि हम आगे बढऩा चाहते हैं। पढ़ाई कर अपने पैरों पर खड़ा होना चाह रहीं हूं, आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण कई बार आत्मविश्वास डिग जाता है। पिता छोटेलाल चक्रवर्ती का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है, अब वे मजदूरी नहीं कर पाते हैं। मैं दिव्यांग होने के कारण आसानी से काम नहीं कर पाती। मां सुम्मी बाई घर का कामकाज देखती हैं। तीन भाई हैं जो अपने-अपने परिवार के साथ रह रहे हैं। ऐसे में डर सता रहा है कि मैं अपने सपनों को कैसे साकार कर पाऊंगी।
ये हैं बड़ी चुनौतियां
सुदामा ने कहा कि वह आगे बढ़कर देश का नाम रोशन करना चाहती है। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण पढ़ाई में बाधा आ रही है। सुदामा को डर सता रहा है कि प्रतिदिन का खर्च कैसे वहन होगा, कोर्स पूरा करना भी मुश्किल हो रहा है। प्रतिदिन सिहोरा जाने या फिर प्रैक्टिस के लिए कटनी जाने में डेढ़ सौ रुपए से लेकर 200 रुपए तक खर्च हो रहे हैं, जिसकी व्यवस्था नहीं हो पा रही है, जिसके कारण नियमित रूप से वह कॉलेज नहीं जा पा रही है।
यूपीएससी की तैयारी में समस्या
सुदामा ने पत्रिका से चर्चा के दौरान कहा कि यूपीएससी की तैयारी करना है। घर में इसकी तैयारी नहीं हो सकती, भोपाल, दिल्ली व अन्य बड़े शहरों में पढ़ाई कर सकते हैं, इसके लिए रुपयों की जरुरत है। सुदामा ने बताया कि तत्कालीन कलेक्टर प्रियंक मिश्रा से जॉब की भी मांग की गई थी, उन्होंने कहा था कि फाइनल इयर पूरा नहीं है। घर की कई समस्याएं भी बताईं थीं, पिता के साथ जो समस्या है वह भी बताया। मदद की गुहार लगाई, लेकिन सिवाय आश्वासन को कुछ हाथ नहीं लगा।
ऐसे बढ़ा है आत्मविश्वास
पत्रिका से चर्चा के दौरान सुदामा चक्रवर्ती ने कहा कि जबसे एक दिन की कलेक्टर बनीं हूं तो मैने संकल्प लिया है कि अब मैं वास्तव में कलेक्टर बनूंगी। आइएएस ऑफिसर बनकर देश की सेवा करना चाहती हूं। जबसे मैने नेत्रहीन प्रांजुल पांडेय के बारे में सुना है तो मेरा भी आत्मविश्वास और बढ़ गया है। सुदामा ने कहा कि दिव्यांगता अभिषाप नहीं है, मेरे अंदर कौन से कमी है जो मैं आइएएस बनने का सपना पूरा नहीं कर सकती।
वर्जन
जिले की होनहार बेटी की प्रतिभा को पूरा सम्मान मिलेगा। सीएसआर मद से हर संभव मदद की जाएगी। विश्व दिव्यांग दिवस पर बेटी को बतौत अतिथि भी हम बुलाएंगे। इसके अलावा पढ़ाई व जूडो प्रैक्टिस के लिए भी विशेष पहल करेंगे, ताकि बेटी आगे बढ़कर लोगों के लिए मिसाल बने।
अवि प्रसाद, कलेक्टर।
Published on:
03 Dec 2022 09:33 pm
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