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सालाना खर्च हो रहे 12 करोड़, फिर भी शुद्धता व लीकेजे सुधारने अबतक नहीं स्काडा सिस्टम, सिर्फ पानी के फ्लो व कुछ टंकियों में भरने का लगा है सिस्टम

तत्काल गुणवत्ता व लीकेज रोकने नहीं कोई इंतजाम, नालों के अंदर से पुरानी जर्जर पाइप लाइन, सीवर लाइन की खुदाई से क्षतिग्रस्त होने व अन्य कारणों से शहर के कई वार्डों में शुरुआती दौर में आता है खराब पानी

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कटनी

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Balmeek Pandey

Jan 19, 2026

Water

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कटनी. नगर निगम द्वारा शहर में 23 हजार घरों में लगभग दो लाख लोगों को पानी पिलाने का दावा किया जा रहा है। पेयजल योजना में नगर निगम द्वारा हर साल लगभग 11 से 12 करोड़ रुपए फूंके जा रहे हैं। जलकर की डिमांड साढ़े 6 करोड़ रुपए है, जो हर साल औसतन 4 करोड़ रुपए वसूल हो पाते हैं। शहर में बैराज, फिल्टर प्लांट से 45 वार्डों में 380 किलोमीटर पानी की डिस्ट्रीब्यूशन लाइन, 450 किलोमीटर की मेन पाइप लाइन डली है। लगभग 20 किलोमीटर की लाइन गंदे नाले व नालियों से होकर जा रही है। शहर की 80 फीसदी आबादी कटनी नदी के पानी पर आश्रित है, बावजूद इसके पानी की शुद्धता और लीकेजे को ठीक करने के लिए स्काडा सिस्टम शहर में लागू नहीं है।
स्काडा सिस्टम न होने से पानी की गुणवत्ता की जांच नहीं हो पाती, समय पर लीकेज ठीक नहीं हो पाता। यदि कहीं पर लीकेज होता है तो काफी दूर तक खोदकर कई दिन सुधार में लग जाते हैं। आधुनिक युग में टै्रकिंग व निगरानी प्रणाली नगर निगम से बहुत दूर है। विशेषज्ञों की मानें तो यदि स्काडा सिस्टम लागू हो जाता है तो जल की गुणवत्ता, लीकेज और आपूर्ति पर रियल टाइम नियंत्रण संभव हो सकता है। लेकिन स्काडा सिस्टम को अनिवार्य करने न तो अफसर ध्यान दे रहे और ना ही जनप्रतिनिधि। जल शोधन के लिए अंदाज में ही दवाओं का मिलान हो रहा है।

पुरानी व्यवस्था दे रही दगा

शहर में लगभग 25 से 30 साल पुरानी पाइप लाइन है, जो जर्जर हो चुकी है। गंदे नाले व नालियों से लाइन बिछी होने के कारण गंदे पानी की सप्लाई हजारों घरों तक हो रही है। हैरानी की बात तो यह है कि लगभग 121 किलोमीटर की डिस्ट्रीब्यूशन लाइन, लगभग 35 किलोमीटर की मेन लाइन, 7 टंकियों का निर्माण आदि की योजना पर तीन साल से प्रस्ताव, टेंडर व स्वीकृति का खेल चल रहा है, लेकिन अबतक पुरानी लाइनों को बदलने का काम नहीं हो पा रहा।

ट्रैकिंग सिस्टम है फेल

हर साल 11 से 12 करोड़ रुपए पेयजल व्यवस्था में फूंकने के बाद भी ट्रैकिंग सिस्टम बेहद कमजोर है। फिल्टर प्लांट में कैमिस्ट द्वारा अंदाज में एलम, क्लोरीन आदि मिलने का काम हो रहा है। जल शोधन संयंत्र सहित सैकड़ों किलोमीटर की लाइन में यदि लीकेज के कारण खराब पानी लोगों के घर में पहुंच रहा है तो नगर निगम को पता नहीं चल पाता, क्योंकि ट्रैकिंग सिस्टम नहीं है। शहर में लीकेज की समस्या पुरानी पाइप लाइन, सीवर लाइन के कारण हो रही खुदाई है। सेंसर लगाने के लिए सिस्टम शासन स्तर पर लंबित है।

आइओटी सेंसर सिस्टम पर नहीं अमल

ओवर हेड टैंक से पानी निकल रहा है तो उसकी ऑटोमेटिक जांच होनी चाहिए, इसके टेंडर होने हैं, लेकिन कोई पहल नहीं हो रही है। स्काडा सिस्टम यहां पर सिर्फ फ्लो मेजर सिस्टम पर काम कर रहा है व कौन सा पंप चल रहा है, कौन सी टंकी भरी जा रही है सिर्फ यह बता रहा है। गुणवत्ता की जांच नहीं हो पा रही। आयेदिन लोगों के घरों में मटमैले, दुर्गंधयुक्त पानी आने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

यह है स्काडा सिस्टम

स्काडा सिस्टम एक आधुनिक तकनीक है, जिसकी मदद से सटीक समय पर यह पता चल जाता है कि कितना पानी पंप किया गया, कितना पानी संबंधित जग पर पहुंचा, कितने पानी का नुकसान हुआ। शहर के फिल्टर प्लांट, बैराज व शहर की टंकियों व लाइन में यह सिस्टम अबतक लागू नहीं हो पाया। शहर की 33 टंकियों में से 18 टंकियों में सेंसर सिस्टम काम कर रहा है लेकिन यह गुणवत्ता नहीं बल्कि पानी का फ्लो और मात्रा बताता है। पीएच, गंदलापन नहीं बता पाता।

स्काडा से यह होगा फायदा

  • पानी की बचत होगी।
  • मेन पॉवर कम होगा।
  • मरम्मत का खर्च बचेगा।
  • पानी की गुणवत्ता का पता चलेगा।
  • सुधार भी ऑटोमेटिक हो जाएगा।
  • एक बिंदु से दूसरे बिंदु का लीकेज मिलेगा।
  • अधिकारियों को सटीक जानकारी मिलेगी।

वर्जन

शहर की कुछ टंकियों में सेंसर सिस्टम काम कर रहा है। स्काडा सिस्टम लागू करने की योजना है, जिसे शीघ्र चालू कराया जाएगा। लीकेज की शिकायत मिलने व गंदा पानी आने पर जांच कराई जाती है। लोगों को शुद्ध पेयजल मिले, इसके लिए विभाग सक्रियता से काम कर रहा है।

सुधीर मिश्रा, कार्यपालन यंत्री।