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असमय सिर से उठा पिता का साया, मां का हुआ एक्सीडेंट, फिर दिव्यांग बेटे ने संभाली घर की बागडोर और बन गया मिसाल, देखें वीडियो

साइकिल के पंचर बनाकर प्रतिदिन कमा रहा 400 रुपए, हादसे ने बदली सोच

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कटनी

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Balmeek Pandey

Apr 24, 2018

Divyang

World Disability Day: It is seen responsible for the pain of Divyang

कटनी. उम्र महज ६ साल..., अचानक पिता की तबीयत बिगड़ जाना और कुछ समय के बाद सिर से पिता का साया छिन जाना। किसी तरह मां ने बच्चों का मुंह देखकर उनके सहारे जी लेने के जज्बे के साथ मेहनत मजदूरी कर बच्चों का पालन पोषण करने लगी लेकिन अचानक एक दिन मां छंगी बाई भी हादसे का शिकार हो गई। एक्सीडेंट में उसे गंभीर चोट आ गई। मां मेहनत मजदूरी कर पाने में असमर्थ हो गई। मां के इस हालात को देख कर पैरों से पूरी तरह दिव्यांग विष्णु कुमार गोटिया पिता स्वर्गीय गणेश प्रसाद गोटिया (30) साल निवासी तिलक कॉलेज छोटी खिरहनी ने अपनी सोच बदली और कुछ कर गुजरने के जज्बे के साथ मेहनत-मजदूरी के लिए निकल पड़ा। 10 साल तक वह एक साइकिल की दुकान में पंचर बनाता रहा। एक दिन उसने साइकिल के कलपुर्जों को सुधारने में महारथ हासिल कर ली और स्वावलंबी बनने की ठान ली। मेहनत करके रुपया कमाते हुए हुए परिवार का पालन पोषण करने लगा और समाज के मिसाल बन गया है। खास बात यह है कि विष्णु के स्वालंबी बनने के कारण विवाह बंधन में बंधने में भी समस्या नहीं आई। सोनिया नाम की लड़की से उसका विवाह तय हुआ। लड़की के परिजनों ने देखा कि विष्णु अपने पैरों पर खड़ा है तो उन्होंने विष्णु के साथ विवाह कर दिया। विष्णु के एक बेटा और बेटी भी है जो मां के साथ खुशहाल जिंदगी का सफर तय कर रहा है।

मेहनत करके जोड़े रुपए
विष्णु ५ साल की उम्र में अचानक पलंग से गिर गया था और पोलियो का शिकार हो गया। दोनों पैरों से चलने में असमर्थ हो गया। होश संभाला तो उसके सामने परिवार की आर्थिक संकट का बोझ नजर आया। इस पर उसने हार नहीं मानी और पंचर जोड़-जोड़कर रुपए कमाने लगा और उसी के साथ बचत करने लगा। विष्णु ८ साल पहले 10000 रुपए जोड़कर स्वयं पंचर व साइकिल बनाने के लिए दुबे कॉलोनी मोड़ में दुकान खोल ली है। विष्णु प्रतिदिन 300 से 400 कमा रहा है और खुशहाल जीवन जी रहा है।

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दिव्यांगों के लिए बना मिसाल
विष्णु का कहना है कि जबसे वह जानने लायक हुआ है तबसे वह अपने आप को कमजोर नहीं समझा। कमजोरी को उसने अपनी ताकत बनाई। पढ़ाई के साथ-साथ यहां-वहां काम करता और रुपए जुटाता। अब विष्णु स्वालंबी बनकर दिव्यांग सहित समाज के लिए मिसाल बन गया है। उसने यह कर दिखाया है कि यदि आपके पास हौंसला हो तो आप दिव्यांग होते हुए भी आसमान की उड़ान भर सकते हैं।

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