
Village changed due to lockdown
कटनी. भौतिक सुख-सुविधाओं के इस दौर में देसी फ्रिज यानी मिट्टी के बर्तनों की मांग सदा से रही है। मटके और सुराही का पानी पीने में जो आनंद आता है, वह फ्रिज के ठंडे पानी में कहां। मिट्टी के बर्तनों की खूबियों को लोग सदियों से जानते रहे हैं। खासकर गर्मी की दस्तक शुरू होते ही शहर हो या गांव इनकी पूछपरख बढ़ जाती है। मटके ले लो... सुराही ले लो..., देसी फ्रिज ले लो.. की आवाजें गर्मियां आते ही सुनाई देने लगती हैं। ग्रामीण इलाकों में तो देसी फ्रिज आज भी अपना वजूद कायम रखे हुए हैं। ऐसा ही कटनी जिले की बड़वारा तहसील क्षेत्र का गांव है रोहनिया। प्राकृतिक स्थल कुडिय़ाघाट को अपनी गोद में संवारे इस गांव की माटी भी बड़ी कमाल की है। यहां की माटी गर्मी में क्षेत्र के दर्जनों गांव में ठंडक घोलती है। रोहनिया के मटके, घैले व सुराही की बड़ी पूछपरख सदियों से है, लेकिन लॉकडाउन के चलते गांव के मटकों की सौंधी खुशबू नहीं महक पा रही। पूरे गांव में इन दिनों महामारी के चलते सन्नाटा जैसे पसरा है। रोहनिया गांव जैसे ही बड़वारा, भुड़सा सहित अन्य गांवों की है।
कई जिलों में जाते थे मटके
रोहनिया गांव मिट्टी के बर्तनों के लिए मशहूर है। संतोष कुम्हार ने बताया कि जिंदगी में ऐसी बीमारी देखी न सुनी जिसने रोजी-रोजगार सब छीन लिया हो, लोग घरों में कैद होने को विवश हों। संतोष कुम्हार व चमरू कुम्हार ने कहा कि गांव के बने मटके न सिर्फ कटनी बल्कि उमरिया, मैहर, जबलपुर सहित अन्य शहर जाते थे। मटके तो तैयार हैं, लेकिन बीमारी के चलते दर्जनों कुम्हारों के बर्तन बने रखे हैं। 26 अप्रैल को अक्षय तृतीय (अकती) का त्योहार है, ऐसे में उन्हें यह डर सता रहा है कि बर्तन नहीं बिकेगे तो फिर आगे की जिंदगी कैसे चलेगी। कुछ मटके गांव से तो बिक रहे हैं, लेकिन उचित दाम नहीं मिल पा रहा।
अद्भुत है यहां का सौंदर्य
रोहनिया गांव में प्रकृति का अनूठा सौंदर्य भी दिखने को मिल रहा है। कुडिय़ाघाट में प्रकृति का अनुपम छटा दिखती है। यहां पर एक गौमुख बना हुआ है, जो सदियों पुराना है। इस गौ मुख से 365 दिन गुनगुना पानी निकलता है। इसकी धार नदी में मिलती है। नदी के पावन तट पर सुंदर हनुमानजी का व शिवजी का मंदिर बना हुआ है, जहां लोग दर्शनपूजन को पहुंचते हैं। मकरसंक्रांति पर यहां पर विशेष मेला भी लगता है। जहां से शिवलिंग निकले हैं वहां से जल की अविरल धारा भी बह रही है।
किसानों के हाल बेहाल
रोहनिया गांव खेती के लिए भी जाना जाता है। यहां पर गेहूं की खेती के साथ सब्जी उत्पादन भी बढिय़ा होता है। लॉकडाउन के चलते किसानों ने कहा कि पुरानी सब्जी को भी बचाने में समस्या हुई है। खेमचंद यादव ने कहा कि गर्मी के सीजन की सब्जी भी बहुत लगाई जाती है, लेकिन लॉकडाउन के चलते किसान निराश हैं और कई किसानों ने तो खेती ही नहीं की। किसी तहर गेहूं, चना आदि की फसल को समेटने में जुटे हुए हैं।
युवाओं की भी थमे कदम
गांव के राममिलन यादव, सोनेलाल असाटी, लक्ष्मण पाटकार, विनोद कचेर, अनिरूद्ध उपाध्याय, प्रमोद पाल, खेमचंद आदि कहा कहना है कि बीमारी ने तो सभी को परेशान करके रख दिया है। सबसे ज्यादा संकट के बादल देहाड़ी मजदूरों के हैं। न तो कहीं काम मिल रहा, ना कोई विशेष मदद। युवाओं के कदम भी थम गए हैं। घर में रहकर युवा अब परेशान हो रहा है। लॉकडाउन खुलते ही काम की तलाश में जुटेगा, ताकि फिर से जिंदगी पटरी पर आ सके।
मिट्टी के बर्तनों के अनेक हैं लाभ
हमारे यहां सदियों से प्राकृतिक चिकित्सा में मिट्टी का इस्तेमाल होता आया है। दरअसल, मिट्टी में कई प्रकार के रोगों से लडऩे की क्षमता पाई जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी के बर्तनों में भोजन या पानी रखा जाए, तो उसमें मिट्टी के गुण आ जाते हैं। इसलिए मिट्टी के बर्तनों में रखा पानी व भोजन हमें स्वस्थ बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। वैसे स्वाद के मुरीद भी मिट्टी के बर्तनों की अहमियत को भली भांति जानते हैं, तभी तो मटके या सुराही के पानी की ठंडक और सौंधापन, उन्हें फ्रिज के पानी से कहीं ज्यादा भाता है। मिट्टी की छोटी-सी मटकी में दही जमाया गया दही गाढ़ा और बेहद स्वादिष्ट होता है।
Published on:
21 Apr 2020 07:38 pm
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