
यूपी के किसान ने अमेरिकन केसर की खेती कर खोला तरक्की का रास्ता, कम लागत लाखों कमा रहे
शिवनंदन साहू
कौशांबी. जिले में किसान केसर की खेती कर कम लागत में अधिक मुनाफा कमा रहे हैं। कश्मीर की ठंडी वादियों में पैदा होने वाले केसर के फूल व उसकी खुशबू अब कौशांबी जैसे मैदानी इलाके मे भी अपनी महक से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने लगे हैं। कौशांबी में पैदा होने वाले केसर के फूलों को अमेरिकन या फिर ईरानी केसर (कुमकुम) कहा जाता है। जिले के दर्जन भर किसान कम लागत व कम मेहनत से केसर की बेहतर उपज पैदा कर खुद तो खुशहाल हैं ही, जिले को भी तरक्की के रास्ते पर ले जाने की मुहिम में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
केसर की खेती करने वाले किसान फूल के साथ उसके दानों को बेंचकर बेहतर मुनाफा कमा रहे हैं। जिले में केसर की खेती करने वाले किसानों को अभी उचित बाजार तो नहीं मिला फिर भी व्यापारी उनके खेत से ही तैयार फूल व दानों की खरीददारी करके ले जा रहे हैं।
जिला उद्यान विभाग ऐसे किसानों को बेहतर बाजार मुहैया करने के साथ ही केसर की अधिक खेती करवाने की जुगत में है। कौशांबी जिले के सिराथू तहसील के चकनारा गांव में लहलहाती सुर्ख केसर की खेती देख कर पहले तो यही लगता है मानों कश्मीर की वादियों में पहुंच गए हो। जिले में केसर की उपज तीन साल पहले से शुरू हुई है। चकनारा गांव के किसान शिव प्रसाद सिंह को किसी महंत ने दो मुट्ठी बीज देकर खेतों में बुआई करने को कहा।
शिव प्रताप ने महंत के दिये गए बीजों को अपने खेत मे बुवाई कर दिया। दो महीने बाद जब बीज ने बड़े पौधे का रूप लिया तो उसमे केसर जैसे फूल देख किसान खुश हो गया। फूलों की तुड़ाई के बाद फसल पक कर तैयार हुई तो काफी मात्रा मे बीज की पैदावार हुई। सर्दियों की शुरुआत में किसान शिव प्रताप ने अपने एक बीघा खेत में बुवाई किया। तीन महीने बाद जब फसल तैयार हुई तो उसमें से लगभग सात कुंतल दाने निकले। फूल व दाने की पहचान से अंजान किसान ने जिला उद्यान अधिकारी से संपर्क किया, तब उसे पता चला कि, वह मैदानी इलाके मे अमेरिकन केसर की खेती कर रहा है। उद्यान विभाग ने लखनऊ के एक व्यापारी से संपर्क कर किसान के खेत से ही उपज को तीन हजार रुपये कुंतल की दर से बेचवा दिय। कम लागत व बेहतर उपज के बाद शिव प्रताप ने इस साल अपने साथ दर्जन भर किसानों के लगभग पच्चीस बीघा खेत मे केसर की बुवाई कराई। इस समय किसानों ने केसर के फूलों की तुड़ाई कर लिया है। फसल भी पाकर तैयार है। लहलहाती फसल देख कर उम्मीद है कि, इस बार भी छह से सात कुंतल प्रति बीघा दानों कि उपज होगी। किसान शिव प्रताप ने मैदानी इलाके में केसर की बेहतर पैदावार खुद भी किया और गांव के दूसरे किसानों को भी करवाया। कई किलों केसर के फूल किसानों ने इकट्ठा कर लिया है। किसानों को अब इस बात की चिंता है कि, केसर के दाने तो उनके खेत से ही बिक जाएंगे। लेकिन फूलों के खरीददार अभी तक नहीं मिले है। इसी बात से चिंतित शिव प्रताप का कहना है कि, केसर के फूल बिक गए तो उनकी वाहवाही होगी वरना साथी किसानो के बीच उफस का पात्र बनेंगे।
हालांकि जिला उद्यान अधिकारी मेवा राम का दावा है कि, जैसे केसर के दानों के व्यापारी मिले है वैसे ही केसर के फूल के व्यापारी किसानों के खेत तक पहुंचेंगे और बेहतर दाम देकर खरीददारी करेंगे। जिस तरह से कौशांबी के दर्जन भर किसानों ने विपरीत परिस्थितियों मे केसर की उपज की बेहतर तरीके से पैदावार किया है। उससे वह तारीफ के हकदार है। बस उन्हे जरूरत है तो सरकारी मदद की। यदि जिले के उद्यान व कृषि विभाग ने केसर की खेती करने वाले किसानों का दिल खोल कर मदद कर दिया तो वह दिन दूर नहीं जब जिले के पहचान केसर के खेती से होने लगेगी। सबसे अहम बात यह कि, केसर की खेती मे खाद व पानी बेहद कम लगता है। ऐसे मे आठ मे से छह ब्लॉकों के डार्क जॉन मे चले जाने की समस्या से जूझ रहे जिले को केसर की खेती हर तरह से फायदे की ओर ले जा सकती है।
Published on:
19 Apr 2018 05:17 pm

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