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दिपावली पर मिट्टी के दीए से रौशन होगा घर आंगन

आधुनिकता की दौर में आज भी ग्रामीण इलाकों में इसकी मांग बहुत होती है। वहीं कुम्हार परिवार लोगों की मांग के अनुरुप मिट्टी के दीए कई डिजाइन में बनाते हैं, लेकिन मंहगाई के इस दौर में इस डिजाइन वाले दीए का उचित दाम नहीं मिल पाता है। इसके चलते ज्यादातर कुम्हार सिंपल गोल दीए ज्यादा बनाते हैं।

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कवर्धा. दीपावली दीपों का पर्व है। इसे ***** धर्म का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। लोग इस त्योहार को बड़े धुमधाम से मनाते हैं। दीपावली की त्योहार जैसे जैसे नजदीक आ रही है। वैसे ही लोग घर व दुकान की साफ सफाई से लेकर रंग रोगन के काम में जुट गए हैं।
इस त्योहार में मिट्टी के दीए का बड़ा महत्व होता है। इसे लेकर कुम्हार द्वारा सप्ताह भर पहले से तैयारी कर ली थी। अब मिट्टी के दीए, कलौरी, नादी के साथ लक्ष्मी की मूर्ति तैयार होकर अंचल के प्रमुख हाट बाजार इंदौरी, दशरंगपुर, गोछिया, रामपुर, बिरकोना, मरका, झिरौनी सहित हर गांव के घर घर पहुंचाने का दौर शुरु हो गया है। मिट्टी के दीए के साथ कलौरी व नादी को टुकने में रख कर घर घर पहुंचने लगे है। आधुनिकता की दौर में आज भी ग्रामीण इलाकों में इसकी मांग बहुत होती है। वहीं कुम्हार परिवार लोगों की मांग के अनुरुप मिट्टी के दीए कई डिजाइन में बनाते हैं, लेकिन मंहगाई के इस दौर में इस डिजाइन वाले दीए का उचित दाम नहीं मिल पाता है। इसके चलते ज्यादातर कुम्हार सिंपल गोल दीए ज्यादा बनाते हंै, जो बहुत प्रचलित होने के कारण ग्रामीणों की खरीदारी से मुनासीब दाम मिल जाती है।

जगमगा उठते हैं पूरे गांव
दीपावली के दिन मिट्टी के दीए से घर घर रौशन होता है। साथ ही एक दुसरे के घर जा कर मिट्टी के दीप जलाकर दिपोत्सव की बधाई देते है। दीपावली पर्व पांच दिनों तक मनाया जाता है। इसकी शुरुआत धनतेरस से हो जाता है। शहरी क्षेत्र में लक्ष्मी पूजा को मुख्य पर्व के रुप में मनाते हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्र में लक्ष्मी पूजा के साथ ही गोवर्धन को मुख्य मानते हैं। इसी तरह ग्राम के समस्त देवी मंदिर, देवालय, खेत खलिहान के साथ प्रत्येक चौक में चौराहों पर मिट्टी के दीए जलाया जाता है। इससे पुरा ग्रामीण अंचल दीपों के रौशनी से जगमगा उठता है।

मिट्टी के दीए का महत्व आज भी
मिट्टी के दीए बेचने वाली बुजुर्ग महिला यह बताती है कि एक दर्जन दीए का दाम २० रुपए से लेकर ४० रुपए तक है। लोगों की मांग अब आकर्षक व चाइना दिया बाजार में उपलब्ध है। इसके चलते देशी दीए की बिक्री में साल दर साल गिरावट आ रही है। धीरे धीरे ग्रामीण अंचल में आधुनिकता भारी पड़ती नजर आ रही है। फिर भी ग्रामीण परम्परा व रिवाज के कारण आज भी देशी दीए के चलन है। पूर्वजों के समय से दीए जलाने की प्रथा चली आ रही है। दीपावली पर्व पर रौशनी के लिए पारंपरिक रुप से उपयोग किए जाने वाले दीए का उपयोग कम कर लोग मोमबत्ती व विद्युत झालरों में अधिक रुचि लेने लगे हैं।