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स्थापना दिवस विशेष: खर- दूषण के आ​धिपत्य से जाना जाता है निमाड़ का जंगल

ऊष्म प्रकृति की जलवायु से दुर्गम जंगल में हैं कई वनस्पति

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The forest of Nimar is known by the domination of Khar-Dushan

The forest of Nimar is known by the domination of Khar-Dushan

खंडवा. मध्य प्रदेश के पश्चिमी छोर में विंध्य एवं सतपुड़ा पर्वत के बीच स्थित है निमाड़। जो कि जीवन दायिनी मां नर्मदा द्वारा पोषित है। जिसे पूर्वी निमाड़ (खंडवा) एवं पश्चिमी निमाड़ (खरगोन) के नाम से जानते हैं। मान्यता है कि त्रेतायुग में निमाड़ की भूमि पर शक्तिशाली राक्षस भाइयों खर- दूषण का आधिपत्य भी रहा है, यह तभी से दुर्गम जंगलों की भूमी है। इसकी जलवायु ऊष्म प्रकृति की है, जिसके चलते निमाड़ अनेकानेक वनस्पतियों का घर है। इनमें प्रमुख हैं, मरोड़ फल्ली जो की कृमि नाशक है और अतिसार में फायदा पहुंचाती है। गोखरू, जिसका प्रयोग आयुर्वेदाचार्य पथरी के निदान में करते हैं। चिरोठा, जो की रक्त शोधक है। इनके अलावा वन तुलसी, कपूर तुलसी जैसी बहुमूल्य वनस्पतियों एवं वन संपदाओं से प्रकृति ने निमाड़ को नवाजा है। यहां के स्थानीय नागरिक महुआ और तेंदूपत्ता के माध्यम से आजीविका का उपार्जन भी बहुतायत में करते हैं। इसलिए यह कहना बिल्कुल उचित है कि निमाड़ की वन संपदा एवं वनस्पति मानव जाति के लिए अनमोल धरोहर है।
100 वर्ष पुराना है बालम खीरा वृक्ष
निमाड़ में 100 वर्ष पुराना बालम खीरा वृक्ष भी है। मप्र जैव विविधता बोर्ड द्वारा प्रदत्त परियोजना कार्य लोक जैव विविधता पंजी निर्माण के समय किए गए सर्वेक्षण में इसे देखा गया। इसका वानस्पतिक नाम केगेलिया पिन्नाटा है। इसका फल विशिष्ट आकार का होने के कारण इसे सॉसेज वृक्ष भी कहते हैं। यह वृद्ध बिग्नोनिएसी कुल का सदस्य है और यह अफ्रीका में सर्वत्र पाया जाता है। इसका फल जहरीला होता है।
गांव वाले पूजते हैं चूड़ी महुआ
महुआ सामन्य तौर पर प्रदेश के प्रतयेक क्षेत्र में मिलता है। लेकिन निमाड़ में एक खास तरह का महुआ खोजा गया है। जिसे चूड़ी महुआ के नाम से लोग जानते हैं। इसका एक नाम बाग्ड्या महुआ है और इसे हड़जोड़ भी कहते हैं। बताते हैं कि इसकी चूड़ीदार छाल का उपयोग हड्डी जोड़ने में किया जाता है। इस वृक्ष को फिलहाल मधुका प्रजाति का माना जा रहा है। खेड़ी इलाके में गांव के लोग इसकी पूजा करते हैं।
खास है हमारा तेली सागौन
खंडवा जिले के पूर्व कालीभीत क्षेत्र में एक खास किस्म का सागौन पाया जाता है, जिसे तेली सागौन कहते हैं। इस सागौन की विशिष्टता यह है कि यह टीक स्केलेटोनाइजर (इल्ली) नामक कीट से बचाव के लिए प्रतिरोधक क्षमता रखता है। इसलिए इस सागौन में फंगस नहीं लगता और यह राज्य के बाकी हिस्सों की अपेक्षा इस इलाके में ज्यादा तेजी से बढ़ता है।