4 फ़रवरी 2026,

बुधवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

भूरी बाई ने पद्मश्री पाकर आदिवासियों के लिए प्रस्तुत किया आदर्श

भील कला को कैनवास पर उतारने वाली भूरी बाई को पद्मश्री सम्मान

2 min read
Google source verification
bhuri bai

bhuri bai

झाबुआ. मप्र की राजधानी भोपाल से दूर आदिवासी अंचल झाबुआ के पिटोल में पली बढ़ी भूरी बाई को पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया है। भूरी बाई को यह सम्मान आदिवासियों की कला को कैनवास पर उतारने के लिए दिया गया। इसी कला के दम पर वे मप्र सरकार की ओर से कला के क्षेत्र में दिया जाने वाला शिखर सम्मान भी प्राप्त कर चुकी हैं। सोमवार को केंद्र सरकार के पद्म पुरस्कारों की घोषण हुई, जिसमें भूरी बाई का भी नाम शामिल है।

झाबुआ जिले के पिटोल में जन्मी भूरी बाई स्वयं भी आदिवासी भील समुदाय से हैं, उनकी कला भी भील समुदाय के आसपास ही है। भूरी चित्रकारी के लिए कागज तथा कैनवास का इस्तेमाल करने वाली प्रथम भील कलाकार हैं।

भूरी बाई भोपाल में आदिवासी लोककला अकादमी में एक कलाकार के तौर पर काम करती हैं। मध्यप्रदेश सरकार उन्हें अहिल्या सम्मान से भी विभूषित कर चुकी है। भूरी बाई के चित्रों में जंगल में जानवर, भील देवी-देवताओं, पोशाक, गहने तथा गुदना (टैटू), झोपडिय़ां आदि प्रमुखता से शामिल होते हैं।

पिता से सीखी पिथौरा कला
जिले के एक छोटे से गांव पिटोल से भोपाल में परिवार के साथ रहकर 25 वर्ष मजदूरी करने वाली भूरी बाई को सरकार ने पद्मश्री सम्मान पाने का हकदार माना है। भूरी बाई को यह सम्मान कला के क्षेत्र में दिया जा रहा है। मजदूरी से कलाकार बनने तक भूरी बाई की कहानी संघर्षों से भरी है। भूरी बाई ने अपने पिता से पिथौरा आर्ट सीखा और देश भर में अपनी कला से धूम मचाई। संघर्ष के दिनों में अपनी प्राचीन विरासत को सहेज कर रखा। पारंपरिक कला के माध्यम से भूरी बाई ने देशभर में खूब नाम कमाया। 45 वर्षीय भूरी बाई को प्रदेश सरकार शिखर सम्मान और देवी अहिल्या सम्मान से सम्मानित कर चुकी है। वर्तमान में भूरी भाई अपने बच्चों और नाती, पोतों को पिथौरा पेंटिंग बनाना सिखा रही हैं।