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रोज बनते 3500 शिवलिंग, नर्मदा के पत्थरों को तराशकर विदेश तक भेज रहे बकांवा के लोग

देशभर से आते हैं खरीददार, एक हजार से लाखों रुपए कीमत के शिवलिंग, मप्र ही नहीं अन्य प्रांतों व विदेशों से बुकिंग, शिवलिंग निर्माता बोले- जिसने सृष्टि को रचा, उसके निर्माण ने दिलाई ख्याति, अहिल्या काल से बकावा में हो रहा शिवलिंग निर्माण

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Khargone

देशभर से आते हैं खरीददार

खरगोन/कसरावद. मप्र के खरगोन जिला मुख्यालय से करीब 60 किमी दूर छोटा सा गांव बकांवा देश-दुनिया के नक्शे पर अलग पहचान रखता है। नर्मदा के तट पर बसे करीब चार हजार आबादी वाले इस गांव की ख्याति महादेव से जुड़ी है। यहां नर्मदा की तलहटी से निकलने वाले प्रत्येक कंकर में हर कोई शंकर देखता है। यही कारण है कि शिवलिंग निर्माण के लिए यह गांव हर किसी की जुबान पर है। कोरोनाकाल के बाद यहां शिवलिंग निर्माण व उसकी बिक्री में गिरावट आई- इसके बाद जहां-जहां शिवमहापुराण कथा हुई और कथा वाचकों ने शिव की महिमा बताई, यहां के कारीगरों के वारे-न्यारे हुए हैं। अहिल्याकाल से शिवनिर्माण की कला में निपुण यहां के बाशिंदे इसी काम से आजीविका चलाते हैं।

बकावा में नर्मदेश्वर शिवलिंग तैयार
बकावां में नर्मदेश्वर शिवलिंग तैयार होते है। इन शिवलिंगों की बिना प्राण प्रतिष्ठा के स्थापना की जा सकती है। प्रतिदिन तकरीबन 3500 शिवलिंग तैयार हो रहे हैं जो शुभ फलदायी माने जाते है। ये शिवलिंग नर्मदा नदी से निकलते हैं। इस कारण इन्हें नर्मदेश्वर शिवलिंग के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि नर्मदेश्वर शिवलिंग की घर में स्थापना करने से लाभ मिलता है।

कारीगर हरेराम वर्मा, केशरीलाल केवट, बालकराम केवट ने बताया यहां बनने वाले शिवलिंग की कीमत एक हजार से लाखों रुपए में है। करीब चार साल पहले सबसे बढ़े 24 फीट ऊंचे शिवलिंग का निर्माण किया गया था। यह शिवलिंग हैदराबाद के एक आश्रम में स्थापित है। कारीगरों ने उनकी आस्था देखकर कोई शुल्क नहीं लिया। लेकिन उन्हें बकावा से हैदराबाद तक शिवलिंग ले जाने में करीब सात लाख रुपए खर्च हुआ था। कारीगरी देख खुकर होकर श्रद्धालुओं ने 50 हजार रुपए इनाम दिया था। नामेदव ने बताया हाल ही में पंडित प्रदीप मिश्रा की कथा महाराष्ट्र में हुई। यहां शिव की महिमा सुन कई स्थानों पर मंदिर निर्माण हुए। शिवलिंग की खरीदारी के लिए श्रद्धालु यहां आए और शिवलिंग ले गए हैं। कोरोनाकाल के पहले तक माह विशेष जैसे सावन व शिवरात्रि पर चार से पांच शिवलिंग गढ़ते थे, लेकिन अभी 15 से 20 शिवलिंग की बुकिंग हुई है।

अपने आप उभरती है आकृतियां
ग्रामीणों ने बताया नर्मदा से निकले पत्थर की खासियत यह है कि उस पर शिवलिंग की आकृतियां अपने आप उभरती हैं। कटिंग के बाद ओम, तिलक, शंख जैसी आकृतियां आम है। इसी से आकर्षित होकर खरीदार बकावा आते हैं। ओम आकृति वाला शिवलिंग महंगे दामों पर बिकता है।

ऐसा पहला गांव जहां गली-गली होते हैं शिव निर्माण
शिवलिंग निर्माण करने वाले कारीगर दीपक नामदेव बताते हैं कि बकावा की कोई गली ऐसी नहीं जहां निर्माण नहीं होता। गांव में करीब 60 परिवार ऐसे हैं जो वर्षों से इसी काम में जुटे हैं। नर्मदा के निर्जीव पत्थरों को तराशकर उन्हें सजीव शिवंलिंग की सूरत देने का काम आधी आबादी कर रही है। इससे बाहर से आए मजदूरों को भी रोजगार मिला है।