
घोषणा में देरी से बंगाल में घट रहा जूट की खेती का रकबा
कोलकाता.
जूट के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा में केन्द्र सरकार की ओर से की जा रही देरी के कारण देश के 40 लाख जूट किसान चिंता में है। इसी वजह से पश्चिम बंगाल के जूट रकबे में 30 फीसदी की कमी होने का अनुमान लगाया जा रहा है। पिछले पांच वर्षों के दौरान केन्द्र सरकार ने फरवरी से लेकर अप्रेल के बीच न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा कर दी थी। अब अप्रेल बीतने को है और किसान समर्थन मूल्य की घोषणा का इंतजार कर रहे हैं।
किसानों के संगठन जूट की खेती को बढ़ावा देने को ले कर केंद्र सरकार की जूट आई केयर योजना पर भी सवाल उठा रहे हैं। उनके मुताबिक समर्थन मूल्य घोषित नहीं किए जाने से भ्रमित हुए किसान जूट के बजाय तिल, बादाम, भुट्टा तथा दलहन की खेती पर जोर दे रहे हैं। राज्य के कृषि विभाग के मुताबिक पिछले साल 7.8 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इस बार जूट के रकबे में 30 फीसदी की कमी का अनुमान है।
मार्च महीने से शुरू होती है बुवाई-
किसानों को हर साल जूट की बुवाई (मार्च महीने) से पहले केंद्र की ओर से समर्थन मूल्य की घोषणा होने का इंतजार रहता है। किसानों, जूट उद्योग और कारोबारियों की नजर २ मई को नई दिल्ली में होने वाली जूट एडवाइजरी बोर्ड की प्रस्तावित बैठक पर टिकी हुई है। बैठक में वर्ष 2018-19 में जूट की खेती की राज्यवार स्थिति पर चर्चा होने तथा जूट के संभावित उत्पादन के मुद्दे पर चर्चा होने की उम्मीद है।
फरवरी से खेती की प्रक्रिया-
जूट उत्पादक राज्यों में पश्चिम बंगाल समेत असम, बिहार, त्रिपुरा, ओडिशा, मेघालय और नागालैंड शामिल हैं। देश के करीब 40 लाख किसान जूट की खेती करते हैं। हर साल जूट की खेती का काम फरवरी महीने से शुरू हो जाता है। देश में कुल जूट उत्पादन का 80 फीसदी पश्चिम बंगाल में होता है। कृषि विभाग के अनुसार समय से पहले समर्थन मूल्य की घोषणा होने से किसान उत्साहित होकर जूट की बुवाई करते हैं।
केन्द्र का ध्यान आकर्षित करेंगे-
पश्चिम बंगाल के कृषि मंत्री प्रो. आशीष बनर्जी के अनुसार किसानों के लिए समर्थन मूल्य मायने रखता है। इसके आधार पर ही किसान अपनी खेती की दिशा तय करते हैं। इस बारे में वे केंद्र सरकार का ध्यान आकर्षित करेंगे।
केंद्र की योजनाओं में देरी-
जूट के जानकारों का मानना है कि भले ही केंद्र सरकार जूट पैकेजिंग मैटेरियल एक्ट-1987 के मद्देनजर किसान, श्रमिक और जूट उद्योग के हितों की बात करती है पर वास्तविकता कुछ और ही है। केंद्रीय एजेंसियों की ओर से जूट के बोरे में कटौती करना, जूट का समर्थन मूल्यों की घोषणा में देरी तथा जूट के भविष्य निर्धारण करने वाली संस्था जूट एडवाइजरी बोर्ड की बैठक में देरी से किसानों पर प्रतिकूल असर पड़ता है। जूट की खेती को लेकर किसान खुद को दिशाहीन पा रहे हैं।
नेशनल जूट बोर्ड के एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि गत वर्ष २२ मार्च को जूट एडवाइजरी बोर्ड की बैठक हुई थी, जो इस बार 2 मई को होने वाली है। जिसमें भारतीय जूट निगम के चेयरमैन तथा प्रबंध निदेशक केवीआर मूर्ति, जूट विकास निदेशालय के निदेशक, इंडियन जूट मिल्स एसोसिएशन के चेयरमैन और जूट बेलर्स एसोसिएशन के चेयरमैन विशेष रूप से उपस्थित होंगे।
Updated on:
21 Apr 2018 09:18 pm
Published on:
21 Apr 2018 11:59 pm
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