6 नवंबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

अभिषेक बनर्जी का भाजपा पर हमला, राष्ट्रपति विवाद और कर्ज के मुद्दे पर केंद्र को घेरा

कोलकाता

•

image

MUKESH VYAS

•

Updated: 9 Mar 2026, 12:40 PM IST

ममता बनर्जी लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए धरने पर बैठी थी, इसलिए राष्ट्रपति का स्वागत नहीं कर सकीं: अभिषेक

कोलकाता. तृणमूल कांग्रेस महासचिव अभिषेक बनर्जी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से जुड़े विवाद और कर्ज के मुद्दे पर भाजपा और केंद्र सरकार पर तीखा हमला किया है। उन्होंने कहा कि तृणमूल पर राष्ट्रपति का अपमान करने का आरोप लगाया जा रहा है, क्योंकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बंगाल के लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए धरना दे रही थीं और व्यक्तिगत रूप से राष्ट्रपति का स्वागत नहीं कर सकीं। उन्होंने कहा कि जब मणिपुर लंबे समय तक हिंसा से जूझ रहा था, जब आदिवासी महिलाओं को सड़कों पर नग्न घुमाया गया और एक पूरा समुदाय न्याय की मांग कर रहा था, तब राष्ट्रपति मौन रहीं। उन्होंने पूछा कि क्या यह हर आदिवासी, हर महिला और हर नागरिक का अपमान नहीं था। जब राम मंदिर का उद्घाटन हुआ, तब भारत की राष्ट्रपति को आमंत्रित नहीं किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि देश की प्रथम नागरिक को उनकी जाति के कारण इस राष्ट्रीय कार्यक्रम से दूर रखा गया। इसी तरह नए संसद भवन के उद्घाटन के समय भी उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया, जबकि यह लोकतंत्र के मंदिर का उद्घाटन था। अभिषेक ने कहा कि भारतीय सशस्त्र बल राष्ट्रपति के अधिकार के तहत काम करते हैं और हर आदेश तथा तैनाती संवैधानिक रूप से उनके अधिकार क्षेत्र में आती है।

कर्ज के मुद्दे पर केंद्र को घेरा

इस दौरान अभिषेक ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान का भी जवाब दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि पश्चिम बंगाल पर लगभग 8 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है और राज्य में जन्म लेने वाला हर बच्चा लगभग 77 हजार रुपए के कर्ज के साथ पैदा होता है। इस आलोचना को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि यही तर्क देश की अर्थव्यवस्था पर भी लागू होना चाहिए। 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे, तब भारत का कुल सार्वजनिक कर्ज लगभग 56 लाख करोड़ रुपये था, जो पिछले 12 वर्षों में काफी बढ़ गया है। उन्होंने दावा किया कि यदि भाजपा कहती है कि बंगाल में हर बच्चा 77 हजार रुपये के कर्ज के साथ पैदा होता है, तो इसी गणना के अनुसार भारत में हर बच्चा लगभग 1.44 लाख रुपए के कर्ज के साथ जन्म ले रहा है। इस तरह की तुलना से यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकार की आलोचना में विरोधाभास है और केंद्र सरकार राजनीतिक कारणों से राज्य के कर्ज को उजागर कर रही है, जबकि इसी अवधि में देश के कुल कर्ज में तेज वृद्धि को नजरअंदाज किया जा रहा है।