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रुपहले पर्दे पर सुनहरा बंगाल – बड़े पर्दे पर भी कविगुरू की अमर कथाओं का जलवा

कविगुरू रविन्द्रनाथ टैगोर की साहित्यिक कृतियों ने बड़े पर्दे को हमेशा प्रेरित किया है। बांग्ला नवजागरण के अग्रदूत रहे टैगोर की मानवीय संवेदनाओं की व्याख्या और चित्रण पर आधारित रचनाओं ने बड़े पर्दे पर आकर भी धूम मचाई।

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रुपहले पर्दे पर सुनहरा बंगाल - बड़े पर्दे पर भी कविगुरू की अमर कथाओं का जलवा

कोलकाता. पश्चिम बंगाल की माटी पर पैदा होकर देश विदेश में अपनी कृतियों, साहित्यिक रचनाओं के जरिए सुयश कमाने वाले कविगुरू रविन्द्रनाथ टैगोर की साहित्यिक कृतियों ने बड़े पर्दे को हमेशा प्रेरित किया है। बांग्ला नवजागरण के अग्रदूत रहे टैगोर की मानवीय संवेदनाओं की व्याख्या और चित्रण पर आधारित रचनाओं ने बड़े पर्दे पर आकर भी धूम मचाई। यूं तो रविन्द्रनाथ टैगोर की रचनाओं पर आधारित फिल्मों का निर्माण उनके जीवन काल में ही शुरू हो गया था लेकिन उनके दिवगंत होने के बाद भी उनकी कृतियों पर आधारित फिल्मों का निर्माण लगातार होता रहा। फिल्मों की कहानियों के प्लॉट और चरित्रों के लिए रविन्द्र साहित्य की भूमिका आने वाले दशकों में और तेजी से महत्वपूर्ण होती गई। वहीं उनके संगीत को भी भारतीय संगीत निर्देशकों ने अपनी फिल्मों का संगीत बनाने में पूरी दरियादिली दिखाई।

कलाओं के संरक्षक और रचनाशीलता की बंाग्ला परंपरा के पितृपुरुष रविन्द्रनाथ टैगोर की कृति पर आधारित पहली फिल्म सन 1927 में तैयार हो गई थी। फिल्म का नाम बलिदान था और उसके निर्देशक नानंद भोजाई और नवल गांधी थे। तेजी से लोकप्रिय हो रहे कैमरे के माध्यम की ताकत पहचान कर रविन्द्रनाथ टैगोर ने भी फिल्म निर्माण के काम में हाथ दिया। टैगोर निर्देशित नटीर पूजा 1932 में तैयार हुई। हालांकि बाद में टैगोर लेखन व अन्य कलाओं में व्यस्त हो गए और नटीर पूजा उनके द्वारा निर्देशित पहली और आखिरी फिल्म साबित हुई। टैगोर ने भले ही फिल्म निर्देशन न किया हो लेकिन फिल्म निर्देशक नियमित अंतराल में टैगोर की रचनाओं को रुपहले पर्दे पर गढ़ते रहे। नितिन बोस ने 1947 में टैगोर की रचना पर नौका डुबी पर आधारित फिल्म मिलन का निर्माण किया। 1961 में नितिन बोस निर्देशित फिल्म काबुलीवाला में एक बार फिर टैगोर साहित्य की अमरता ने बड़े पर्दे के दर्शकों को अपनी ओर खींचा। अगले ही दशक में शुभेन्दु राय निर्देशित उपहार रिलीज हुई। फिल्म टैगोर की कृति सम्पति पर आधारित थी। 1991 में गुलजार ने टैगोर की रचना क्षुदित पसान पर आधारित फिल्म लेकिन का निर्माण किया। 1997 में एक बार फिर टैगोर की रचना चार अध्याय पर कुमार शाहनी ने चार अध्याय नाम की फिल्म बनाई। इसके बाद बांग्ला निर्देशक ऋतुपर्णो घोष ने रविन्द्र साहित्य को एक के बाद एक बड़े पर्दे पर उतारा। वर्ष 2003 में आई ऐश्वर्या राय, राइमा सेन, प्रसन्नजीत अभिनीत चोखेर बाली विश्वस्तर पर सराही गई। इसके बाद ऋतुपर्णो ने ही वर्ष 2011 में टैगोर की साहित्यिक रचना नौका डुबी से प्रेरित होकर हिंदी फिल्म कशमकश का निर्माण किया।

फिल्मों के साथ साथ रविन्द्र संगीत भी फिल्मों में अपनी जगह बनाता रहा। बॉलीवुड के कई मशहूर संगीतकार मसलन एसडी बर्मन, आरडी बर्मन, हेमंत मुखर्जी ने रविन्द्र संगीत का इस्तेमाल बॉलीवुड की फिल्मों में कर उसे जन जन तक पहुंचाने का कार्य किया। कविगुरू अपनी किताबों, चित्रों और रचनाओं के साथ-साथ उनपर आधारित फिल्मों के लिए भी बॉलीवुड में जाने पहचाने जाते रहेंगे।

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