
कोटा . कहां कहां नहीं ढूंढ़ा था प्रेमा को। दो साल तक दर दर की खाक छानी। परिवार के लोग तो उम्मीदें छोड़ चुके थे कि उसे दोबारा देख सकेंगे, लेकिन ऊपर वाले ने चमत्कार दिखाया और बिछड़ी प्रेमा को परिजनों से मिला दिया। इस मिलन में भाषा भी बाधा नहीं बन सकी। तेरह बरस गुमनामी में रहने के बाद करीब ढाई माह पहले प्रेम बाई को पॉलीटेक्निक कॉलेज परिसर स्थित मां माधुरी बृज वारिस सेवा सदन अपनाघर में लाया गया था। संस्था सदस्यों के प्रयासों से वह अपने घर लौट रही है। तमिलनाडू के सेलन निवासी प्रेमा की फिल्मी कहानी सरीखी जिंदगी में उसे अपना असली घर मिल ही गया।
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उसकी आंखों ने झकझोर दिया था
आश्रम में चिकित्सा कर्मी सुरभि व अब्दुल कादिर ने बताया कि कसार के मानसिंह ने विक्षिप्त सी रह रही प्रेमा के बारे में सूचना दी थी, इस पर टीम के सदस्य उसे लेकर आए। इलाज और नियमित देखभाल से उसकी हालत में कुछ सुधार हुआ। एक दिन अपना घर की सदस्य उषा गोयल आई तो प्रेमबाई ने उनका हाथ पकड़ लिया और कुछ इस तरह से इशारा किया कि वह घर जाना चाहती है। उसकी आंखों में नमी थी। दो ही शब्द समझ में आए एक सेलम, दूसरा तमिल। वहां पुलिस व अन्य सम्बन्धित संस्थाओं से सम्पर्क साधा। खुद प्रेमा की बात करवाई ताकि उसकी भाषा को पहचान सके। आखिर प्रेमा तमिलनाडू के सेलम की रहने वाली निकली। सूचना पर परिजन लेने आए।
सूचना मिली तो दौड़े चले आए
रविवार को प्रेमा के भाई नागेन्द्रन, बहन राजलक्ष्मी, अन्य रिश्तेदार पुष्पावल्ली और कन्नन प्रेमा बाई को लेने आए। वे अपने साथ प्रेमा के साथ के पुराने फोटो भी लेकर आए। कन्नन ने बताया कि प्रेमा मानसिक रूप से कमजोर है। यह 13 वर्ष पहले गुम हो गई थी। इसे ढूंढऩे का काफी प्रयास किया, लेकिन नहीं मिली। हमने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी कि उसे दोबारा देख पाएंगे। ये कहते हुए परिजनों की आंखें नम हो गई। परिजनों को देख प्रेमा की चेहरे पर चमक और आंखों में खुशी के आंसू नजर आए। कन्नन ने बताया कि प्रेमा का बेटा संतोष अब बड़ा हो गया है। पति रंगाचार्य व्यवसाई है।
Updated on:
05 Feb 2018 12:23 pm
Published on:
05 Feb 2018 11:04 am
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