
रणजीतसिंह सोलंकी
चम्बल की धरती पर उपजे धनिये की खुशबू सात समंदर तक महकती है, लेकिन हाड़ौती के धनिये पर ठप्पा लगता है गुजरात का। गुजरात के निर्यातक हाड़ौती की मंडियों से धनिया खरीद कर ले जाते हैं और वहां ग्रेडिंग कर निर्यात करते हैं। इस कारण यहां की ग्रेडिंग इकाइयों पर भी संकट आ गया है। कोटा में मसाला पार्क की स्थापना हो जाए, तो यहां बड़ी संख्या में एग्रो प्रोसेसिंग यूनिट लग सकती हैं।
हाड़ौती में उत्पादित धनिये की गुणवत्ता को देखते हुए केन्द्र और राज्य सरकार के साझा कार्यक्रम के तहत वर्ष 2005 में कृषि निर्यात जोन (एईजेड) बनाया गया था, लेकिन सरकारी सुस्ती के चलते यह योजना फाइलों में ही सिमट कर रह गई। इसका न तो लाभ धनिया उत्पादक किसानों को मिला और न व्यापारियों को। प्रदेश में कोटा संभाग धनिये उत्पादन में शीर्ष पर है, लेकिन सरकारी उदासीनता व प्रतिकूल मौसम के कारण उत्पादन लगातार घट रहा है। कोटा खण्ड में तीन लाख हेक्टेयर धनिये की बुवाई होती थी, लेकिन इस साल करीब 50 से 80 हजार हेक्टेयर में ही बुवाई का अनुमान है।
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95 फीसदी धनिये का उत्पादन कोटा संभाग में होता है
धनिया उत्पादन में राजस्थान पहले पायदान पर
285000 मीट्रिक टन धनिये का औसत उत्पादन
27810 मीट्रिक टन धनिये का हाड़ौती से सीधा निर्यात
150 से अधिक धनिये की ग्रेडिंग इकाइयां संचालित हैं कोटा खण्ड में
कोटा में मसाला पार्क खुले तो लग सकती हैं नई प्रोसेसिंग यूनिटें
Published on:
04 Feb 2024 11:06 am
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