Badoli Shiv Temple news: कोटा. (हेमंत शर्मा )रावतभाटा के पास बाड़ौली मंदिर समूह से ढाई दशक पहले चोरी हुई मूर्ति के अपने घर लौटने का इंतजार है। 10 वीं शताब्दी की नटराज की प्रतिमा 1998 में बाड़ौली के घाटेश्वर मंदिर से चोरी हो गई थी। चोरी की ये मूर्ति लंदन पहुंच गई थी। लंबे इंतजार के बाद सरकार के प्रयासों के बाद प्रतिमाएं लंदन से दिल्ली आ गई है और दिल्ली में आर्किलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पास संरक्षित है।
नकली मूर्ति रख दी थी, असली बेच दी थी
बाड़ाैली से फरवरी 1998 में यह मूर्ति चोरी हुई थी। चोरों के एक गिरोह ने मूर्ति को चुरा लिया था। चोरी के कुछ माह बाद नटराज की मूर्ति जगल में मिल गई थी। विभाग ने असली मूर्ति समझकर गोदाम में रखवा दिया। ऑपरेशन ब्लैक हॉल के दौरान जुलाई 2003 में खुलासा हुआ कि मूर्ति चोरों ने जो मूर्ति रखी थी, वह नकली थी। असली मूर्ति 85 लाख में लंदन में बेच दी थी।
शिल्पकला का बेजोड़ नमूना है बाड़ौली शिव मंदिर समूह
शिल्पकला और बेजोड़ डिजाइन से अलंकृत बाडौली मंदिर की मूर्तिया पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं। बाडौली के मंदिरों का समूह कोटा से लगभग 50 किमी दूर चित्तौड़गढ़ जिले में रावतभाटा से मात्र 5 किलोमीटर दूर स्थित है। बाडौली प्राचीन स्थापत्य कला की दृष्टि से राजस्थान का प्रसिद्ध स्थल है।
यहां स्थित मंदिर समूह का काल 8वीं से 11वीं शताब्दी तक का है। नवीं तथा दसवीं शताब्दी में यह स्थल शैव पूजा का एक प्रमुख केंद्र था, जिनमें शिव तथा शैव परिवार के अन्य देवताओं के मंदिर थे। यहां स्थित मंदिर समूह में नौ मंदिर हैं, जिनमें शिव, विष्णु, त्रिमूर्ति, वामन, महिषासुर मर्दिनी एवं गणेश मन्दिर आदि प्रमुख हैं। बाडौली के 9 मंदिरों में से आठ दो समूहों में हैं। मंदिर संख्या 1-3 जलाशय के पास हैं एवं अन्य पांच मंदिर इनसे कुछ दूर एक दीवार से घिरे अहाते में स्थित हैं, जबकि एक अन्य मंदिर उत्तर-पूर्व में लगभग आधा किलोमीटर दूर स्थित है।
यहां के इस मंदिर समूह में शिव मंदिर प्रमुख हैं, जो घाटेश्वर शिवालय के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में शिव के नटराज स्वरूप को उत्कृष्टता से दिखाया गया है। यह उड़ीसा शैली के मंदिरों से मिलता-जुलता है। अलंकृत मंडप, तोरण द्वार, मूर्तियों की भंगिमाएं, लोच व प्रवाह, शिव का बलिष्ठ स्वरूप आदि इसकी विशिष्टता है।
कर्नल टॉड द्वारा खोजे गए दो अभिलेखों में से कार्तिक सुदी द्वादशी संवत् 989 के एक अभिलेख में व्याकुलज द्वारा सिद्धेश्वर मंदिर के जीर्णोद्धार का उल्लेख मिला है, जबकि संवत 963 चैत्र सुदी 5 के दूसरे अभिलेख में व्याकुलज ने ही शिव मंदिर के निर्माण का जिक्र किया गया है। मंदिर स्थापत्य कला में मुख्यतः चार भागों गर्भगृह, अंतराल, मुखमंडप व शिखर में विभाजित है। श्रंगार चौकी यहां विशेष है।
कोटा में लाई जाए मूर्ति
मामले में जेडीबी कॉलेज से सेवानिवृत्त प्रो. सुषमा आहूजा ने बताया कि केन्द्र सररार ने प्रतिमाओं के रूप में देश की खोई विरासत को वापस लाने के क्षेत्र में अच्छा कार्य किया है। शिव हमारी आस्था के केन्द्र हैं। लंदन से नटराज की मूर्ति का भारत में आना अच्छी बात है, लेकिन अब इसे दिल्ली से लाकर कोटा के संग्रहालय में संरक्षित किया जाए तो इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।