
रावतभाटा. शहर से करीब साढ़े तीन किलोमीटर की दूर भैंसरोडगढ़ अभयारण्य में चंबल नदी का एक ऐसा किनारा है, जो मगरमच्छों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं।
यहां हर वर्ष मगरमच्छ न केवल प्रजनन कर अंडे देते हैं वरन अपने बच्चों का लालन-पालन भी इसी किनारे पर करते हैं। ये है भैंसरोडगढ़ अभयारण्य का क्रोकोडाइल प्वाइंट।
भैंसरोडगढ़ अभयारण्य की सीमा के भीतर चंबल नदी का किनारा, जो वर्ष भर राणाप्रताप सागर बांध के भरे रहने से हमेशा पानी से लबालब रहता है।
ऐसे में यहां आसपास के किनारे पर मिट्टी, प्राकृतिक वातावरण और खाने के लिए भरपूर मछली और कांई रहती है। इन सभी की एक साथ मौजूदगी ने इस जगह को मगरमच्छों के लिए मुफीद बना दिया है।
दूर-दूर से आते हैं पर्यटक
भैंसरोडगढ़ अभयारण्य में क्रोकोडाइल प्वाइंट पर वन विभाग की ओर से एक वॉच टॉवर बनाया गया है। तीन मंजिला इस वॉच टावर से नदी किनारे सुस्ता रहे मगरमच्छ व उनके बच्चों को देखा जा सकता है। सर्दी में धूप सेंकते तो यहां दर्जनों मगरमच्छ नजर आते हैं। इसके अलावा यहां से पहाड़ों के बीच चंबल नदी के प्राकृतिक नजारे बरबस ही किसी का भी मन मोहने के लिए काफी हैं।
वन्यजीवों का बेहतर संरक्षण
अभयारण्य में वन्यजीवों का बेहतर संरक्षण हो रहा हैं। नतीजन यहां वन्यजीवों की संख्या में खासी वृद्धि हो रही है। मगरमच्छों के अलावा वनक्षेत्र में नीलगायों की भी अच्छी तादाद है। इसके अलावा यहां भालू, पैंथर, जरख, खरगोश, लोमड़ी, सियार, मोर, तोते, गिद्ध, तीतर व कोबरा, अजगर समेत कई तरह के सर्प, पक्षी व वन्यजीव फल-फूल रहे हैं।
आ रहा है मगरमच्छों को रास
क्रोकोडाइल प्वांइट की परिस्थितियों मगरमच्छों के व्यवहार के अनुकूल हैं। इस पर यहां इनके संरक्षण का भी पूरा ध्यान रखा जाता है। चंबल नदी में वर्ष भर पानी रहने व नदी में मछलियां व अन्य आहार की सुगमता होने से यह स्थान मगरमच्छों को खासा रास का आ रहा है।
अनुराग भटनागर, क्षेत्रीय वन अधिकारी, भैंसरोडगढ़ अभयारण्य
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