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नए साल से पहले चीता आकर चला गया, दे गया खुश खबर…नामीबिया से कम नहीं बारां के जंगल

कोटा.(हेमंत शर्मा) मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से चीता ‘अग्नि’ के बारां जिले के जैतपुरा (केलवाड़ा) के जंगलों में पहुंचने की घटना को हाड़ौती के वन्यजीव प्रेमी सुखद बता रहे हैं। हालांकि कूनो की टीम चीते को ट्रेंक्यूलाइज कर वापस ले गई, लेकिन जिस तरह से चीता खुद चलकर बारां के जंगलों में आया है, उससे यह माना जा रहा है कि यह क्षेत्र चीतों के लिए काफी मुफीद है। बारां के शेरगढ़ को चीतों की दृष्टि से विकसित किया जा सकता है। कूनो का क्षेत्रफल 748 वर्ग किमी है। चीतों के स्वभाव, संख्या व टैरेटरी को देखते

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कोटा

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Hemant Sharma

Dec 29, 2023

कोटा.(हेमंत शर्मा) मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से चीता ‘अग्नि’ के बारां जिले के जैतपुरा (केलवाड़ा) के जंगलों में पहुंचने की घटना को हाड़ौती के वन्यजीव प्रेमी सुखद बता रहे हैं। हालांकि कूनो की टीम चीते को ट्रेंक्यूलाइज कर वापस ले गई, लेकिन जिस तरह से चीता खुद चलकर बारां के जंगलों में आया है, उससे यह माना जा रहा है कि यह क्षेत्र चीतों के लिए काफी मुफीद है। बारां के शेरगढ़ को चीतों की दृष्टि से विकसित किया जा सकता है। कूनो का क्षेत्रफल 748 वर्ग किमी है। चीतों के स्वभाव, संख्या व टैरेटरी को देखते हुए क्षेत्र को अपर्याप्त बताया जा रहा है। ऐसे में शेरगढ़ चीतों को बसाने की दृष्टि से अच्छा विकल्प हो सकता है। चीते को ट्रेंक्यूलाइज करने आई टीम ने केलवाड़ा रेंज के खंडेला व बांझआमली को नामीबिया की तरह बताया है।

चीतों को ऐसे क्षेत्र आते हैं पसंद

चीतों की नस्ल उन क्षेत्रों में अधिक पनपती है, जहां मैदानी इलाका बड़ा होता है। इसमें शिकार की संख्या भी अधिक होती है। चीता खुले मैदानों और अर्धमरूभूमि, घास का बड़ा मैदान और मोटी झाड़ियों के बीच रहना पसंद करता है। नामीबिया में चीते घासभूमि, सवाना के जंगलों, घास के बड़े मैदानों और पहाड़ी भूभाग में रहते हैं।

कूनो का क्षेत्रफल कम, इसलिए यहां आया

एक रिपोर्ट के अनुसार सामान्य रूप से एक मादा चीते की टैरेटरी 50 से 350 वर्ग किमी तक हो सकती है। नर चीते अक्सर समूह बनाकर रहते हैं। इनकी होमरेंज 750 से 1000 किमी तक हो सकती है। एक मादा चीता दूसरे चीते से करीब 20 किमी का फासला रखती है। ऐसे में कूनो के करीब 750 वर्ग किमी क्षेत्र में 3 नर व 2 मादा चीते ही रह सकते हैं।

यहां तलाशी जा चुकी हैं संभावनाएं

चीता प्रोजेक्ट के प्रारंभ में विभिन्न स्थानों पर विशेषज्ञों की टीम ने जंगलों में संभावनाएं तलाशी थी। डब्ल्यूआईआई से तत्कालीन वन्यजीव वैज्ञानिक यदुवेन्द्र देवसिंह झाला आए थे। उन्होंने क्षेत्र को चीतों की बसावट के लिए मुफीद माना था।

शेरगढ़ बन सकता है आदर्श घर

हमलोग संस्था के डॉ. सुधीर गुप्ता बताते हैं कि बारां में चीता आना ठीक वैसा ही है, जैसे पहले मुकुन्दरा रिजर्व में बाघ ब्रोकन टेल आया था। अब कूनो से निकलकर चीता केलवाड़ा के जंगलों में आया है, यह अच्छे संकेत हैं। गांधी सागर, शेरगढ़ व मुकुन्दरा को चीतों के अनुकूल पाया गया था।

अनुकूल है क्षेत्र

बारां में उपवनसंरक्षक दीपक गुप्ता ने बताया कि क्षेत्र चीतों के अनुकूल है। कूनो की डिस्टेंस भी ज्यादा नहीं है। खंडेला व बांझआमली तो श्रेष्ठ है ही, शेरगढ़ व मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व को पूर्व में चीतों के अनुकूल माना जा चुका है।