
मेडिकल कॉलेज में सोमवार को इस वर्ष का दूसरा देहदान हुआ। शिक्षा विभाग में वरिष्ठ लिपिक से सेवानिवृत्त प्रतापनगर दादाबाड़ी निवासी ब्रदीप्रकाश नागर (62) की पार्थिव देह को परिजनों ने कॉलेज को दान दिया।
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उनके पुत्र राकेश कुमार ने बताया कि पिताजी पिछले दो दिन पहले कमलेश्वर महादेव में पूजा करने गए थे, वहां सुबह धर्मशाला में उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके शव को कोटा लेकर आएं।
उन्होंने वर्ष 2014 में मेडिकल एजुकेशन के लिए देहदान की घोषणा कर संकल्प पत्र भी भर दिया था। उनकी इच्छानुसार देहदान का संकल्प पूरा किया गया। ब्रदीप्रकाश की शवयात्रा घर से न्यू मेडिकल कॉलेज पहुंची। वहां शरीर रचना विभाग के चिकित्सकों को उनका शव सौंपा। एनाटोमी विभागाध्यक्ष डॉ. प्रतिमा जायसवाल ने परिजनों को देहदान का सर्टिफिेकेट सौंपा।
हर वर्ष 25 चाहिए, छह साल में केवल 16 देहदान
मेडिकल कॉलेज में हर साल करीब 25 बॉडी टीचिंग, रिसर्च और सर्जरी स्किल बढ़ाने के लिए चाहिए, लेकिन अभी तक केवल छह साल में 16 देह ही कॉलेज को मिली हैं। कॉलेज में फस्र्ट ईयर में 150 मेडिकोज को शरीर रचना के ज्ञान के लिए उन्हें डिस्सेक्शन सिखाया जाता हैं।
एमसीआई के नियमों के अनुसार, प्रत्येक दस मेडिकोज पर एक बॉडी डिस्सेक्शन के लिए चाहिए, लेकिन बॉडी की कमी से ऐसा नहीं हो पा रहा हैं। 25 से ज्यादा मेडिकोज एक ही बॉडी पर डिस्सेक्शन करना पड़ता हैं। पीजी व सर्जरी स्किल्स के लिए भी 10 शवों की आवश्यकता होती हैं। विभागाध्यक्ष डॉ. जायसवाल ने भी माना कि पढ़ाई के लिए शवों की कमी रहती हैं।
पहले लावारिस शवों के भरोसे थे
मेडिकोज को शरीर रचना पढ़ाने के लिए पहले लावारिस मृतकों के शव को उपयोग लिया जाता था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इन शवों का पोस्टमार्टम करवाया जाता हैं। पीएम के बाद शव डिस्सेक्शन के काम नहीं आती हैं।

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