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विश्व होम्योपैथी दिवस आज: असाध्य बीमारियों का होम्योपैथी में कारागर इलाज

असाध्य बीमारियों का होम्योपैथी में कारागर इलाज है। इसमें थोड़ा समय लगता है, लेकिन इस पैथी में बीमारियों को जड़ से खत्म कर देता है। इसकी बदौलत आज वे अपनी बेहतर जिंदगी जी रहे है। 10 अप्रेल को विश्व होम्योपैथी दिवस मनाया जाता है। होम्योपैथी की शुरूआत 1796 में जर्मन में सुमैअल हैनीमैन ने की थी।    

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कोटा

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Abhishek Gupta

Apr 10, 2023

विश्व होम्योपैथी दिवस आज: असाध्य बीमारियों का होम्योपैथी में कारागर इलाज

विश्व होम्योपैथी दिवस आज: असाध्य बीमारियों का होम्योपैथी में कारागर इलाज

कोटा. असाध्य बीमारियों का होम्योपैथी में कारागर इलाज है। इसमें थोड़ा समय लगता है, लेकिन इस पैथी में बीमारियों को जड़ से खत्म कर देता है। इसकी बदौलत आज वे अपनी बेहतर जिंदगी जी रहे है। 10 अप्रेल को विश्व होम्योपैथी दिवस मनाया जाता है। होम्योपैथी की शुरूआत 1796 में जर्मन में सुमैअल हैनीमैन ने की थी। इसी दिन इनका जन्म भी हुआ था। विश्व में एलोपैथी के बाद दूसरे नम्बर पर होम्योपैथी है। इसे 236 साल हो गए है। सीनियर होम्योपैथीक चिकित्सक बनवारी मित्तल ने बताया कि होम्योपैथी चिकित्सा सरल, सुलभ है, इसका कोई साइड इफैक्ट नहीं है। हर बीमारी का इलाज कम खर्चे पर होता है। असाध्य बीमारियों में भी कारागर इलाज है।

असाध्य बीमारियों का ऐसे कारागर

गेहूं की एलर्जी हो गई जड़ से खत्म

कानपुर निवासी तनिष्क ककड़ आईआईटी की तैयारी के लिए कोटा में कोचिंग करने आया था। उसे खाने में गेहूं की एलर्जी हो गई। इससे पेट में दर्द, दस्त व कब्जी हो गई। शरीर कमजोर हो गया। कई जगहों पर दिखाया, लेकिन राहत नहीं मिली, फिर उसने होम्योपैथी का इलाज लिया। दो से तीन माह उसके गेहूं खाना बंद कर दिया। लक्षणों के आधार पर दवा दी गई। एक से दो सप्ताह बाद उसे वापस चरणबद्ध तरीके से गेहूं की रोटी बनाकर खिलाना शुरू किया। एलर्जी टेस्ट करवाया, वेल्यू नॉर्मल आई। दो साल के अंदर बीमारी पूरी तरह से जड़ से खत्म हो गई।

बैसाखी से आया, खुद के पैरों पर चला

श्रीनाथपुरम निवासी श्याम को स्लीप ***** की बीमारी हो गई। वह झुक नहीं सकता था। पैरों में सूजन आ गई। हालात यह हो गई कि बैसाखी से चलने लगा। उसने होम्योपैथी का इलाज लिया। चिकित्सक ने उसे लक्षणों के आधार पर दवा दी। उसके बाद 2 से 3 माह बाद ही उसकी बैसाखी छूट गई। 6 से डेढ़ माह तक इलाज के बाद वह अब खुद के पैरों पर चलने लगा। डॉ. मित्तल बताते है कि स्टडी के आधार पर स्लीप ***** में 17 एमएम का गेप आ जाता है। यदि 9 से 18 के बीच गेप आता है तो उसे लक्षणों के आधार पर दवा देकर ठीक किया जा सकता है, लेकिन गेप 9 से नीचे चला जाता है तो उसे सर्जरी की जरुरत पड़ती है। इस केस में भी 9 से 18 के बीच गेप था।

चिकनगुनिया के बाद बढ़ा रुझान

चिकित्सक बताते है कि होम्योपैथी के प्रति आमजन का सबसे ज्यादा रुझान 2005 में चिकनगुनिया आने के बाद बढ़ा है। चिकनगुनिया के समय आमजन ने होम्योपैथी का इलाज लिया था। उसमें 5 से 7 दिन में मरीजों को राहत मिली थी। उसके बाद कोरोना व अब वायरल इंफेक्शन में भी आमजन का होम्पयोपैथी में रुझान बढ़ा है।

हर मर्ज की अलग दवा, हिस्ट्री से होती पहचान

एलोपैथी में बुखार के लिए हर व्यक्ति को पैरासिटामॉल देते हैं। होम्योपैथी में बुखार के लिए हर व्यक्ति की दवा अलग-अलग होती है। यह प्रकृति के आधार पर तय की जाती है। जैसे बीमारी का कारण, मरीज की हिस्ट्री, मरीज का व्यवहार, उसकी पसंद- नापसंद। यह एक सुरक्षित चिकित्सा पद्धति है। इसकी आदत नहीं पड़ती, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों सभी के लिए सुरक्षित है। दवा कारणों को जड़ से नष्ट करती है। इसमें स्थाई इलाज होता है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के प्रथम चरण में एलोपैथी के साथ यदि होम्योपैथी की दवा ली जाए तो काफी फायदेमंद साबित होता है।