
कोटा. इंसानों में स्वाभिमानी के किस्से सुने होंगे। यकीं कीजिए वन्यजीव भी स्वाभिमानी होते हैं। ( Tiger Self respect ) इंसान हो सकता है किसी परिस्थिति में अपने स्वाभिमान को तोड़ भी दे, लेकिन वन्यजीव स्वाभिमान ( Wildlife self respect ) कभी नहीं छोड़ते। वन्यजीवों के जानकारों की मानें तो बाघ से बढ़कर बड़ा स्वाभिमानी कोई दूसरा वन्यजीव कोई नहीं हो सकता। ( Tiger Self respect ) यह अपनी तकदीर का खुद बादशाह होता है। ( tiger king of forest ) दोस्ती से लेकर दुश्मनी अपने ही दम पर निभाता है। न सिर्फ अपने दम पर अपना सामाज्य खड़ा करता है, बल्कि यह समझ लीजिए कि जहां इसकी मौजूदगी है, वह सम्पूर्ण जंगल है। मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व ( mukundra hills tiger reserve kota ) में चार बाघ हैं। ग्लोबल टाइगर डे ( World tiger day 2019 ) पर पढि़ए खास रिपोर्ट।
यूं कह सकते हैं स्वाभिमानी
मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्वके फील्ड डारेक्टर व मुख्य वन संरक्षक आनंद मोहन बताते हैं कि बाघ का सारा जीवन खुद के बलबूते पर होता है। शिकार से लेकर अपनी टेरेटरी बनाने में यह किसी की दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं करता। यह अकेले रहना पसंद करता है। अपनी टेरेटरी बनाने के लिए ये अपने भाई, पिता से भी लड़ जाते हैं। खुद के साथ यह अपनी प्रजा का भी ध्यान रखने वाला होता है। पेट भरने के बाद यह शिकार को छोड़कर चला जाता है, जिसका बाद में अन्य जीव भक्षण करते हैं।
जहां टाइगर वहां सम्पूर्ण जंगल
पूर्व वन अधिकारी व बाघ से पंजा लड़ा चुके दौलत सिंह शक्तावत बताते हैं कि बाघ फूड चैन को बनाए रखता है। इसकी मौजूदगी से जंगल में झाडिय़ों से लेकर जल जीव जंगलसभी सुरक्षित रहते हैं। बाघ पांच से छह दिन में एक शिकार करता है। इस तरह से वर्षभर में औसतन 65 से 70 वन्यजीवों को अपना शिकार बनाता है। जंगल में इसका भोजन पर्याप्त रहे, इसके लिए पांच सौ वन्यजीव होने चाहिए, ताकि शिकार की पूर्ति या उत्पत्ति हो सके। ईको सिस्टम को बनाए रखने में बाघ की महत्वपूर्ण भूमिका है।
हद से गुजर जाते हैं
बायोलॉजिस्ट उर्वशी शर्मा बताती है कि बाघिन अपने बच्चों की रक्षा में जरा भी कोताही बर्दाश्त नहीं करती। जब तक बच्चे बड़े नहीं हो जाते, उनका पूरा ध्यान रखती है, यहां तक कि बच्चों के पिता को भी उन तक नहीं आने देती। उसे खतरा होता है कि कहीं वह बच्चों को नुकसान न पहुंचा दे। बाघ सबसे श्रेष्ठ तैराक व इंसानों में सर्वाधिक लोकप्रिय भी है।
50 के दशक में थे 70 बाघ
50 के दशक में यहां 70 बाघ और 150 पैंथर्स थे। 70 के दशक तक क्षेत्र के जंगलों में महज 15 बाघ रह गए। जानकारों के अनुसार 80 के दशक तक दरा के जंगलों में टाइगर थे। करीब 22 साल के बाद 2003 में ब्रोकन टेल ने दरा के जंगलों में दस्तक दी, लेकिन एक टे्रन हादसे में वो अपनी जान गंवा बैठा।
मुकुन्दरा बना नया आशियाना
3 अप्रेल 2018 को रणथंभौर से निकले बाघ को बूंदी के रामगढ़ से रेस्क्यू कर मुकुन्दरा में छोड़ा गया। अभी यहां बाघ व बाघिनों के दो जोड़े हैं। एमटी-1 व एमटी-2 दरा क्षेत्र में 82 वर्ग किमी क्षेत्र में व एमटी 3 व एमटी 4 रिजर्व के खुले इलाके में विचरण कर रहे हैं। सरिस्का में 15 और रणथंभौर में 60 के बाघ हैं।
Published on:
29 Jul 2019 08:30 am
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