
'बूंद-बूंद से घड़ा भरना इस कहावत के फायदे का असल तर्जुबा इन दिनों हो रहा है। बच्चों की गुल्लक में जमा किए गए छोटे नोट और सिक्के आज बड़े काम आ रहे हैं। यहां तक कि घरों में रोजमर्रा की जरूरत की चीजें भी इसी बचत से आ रही हैं। बड़ों की जेब में बड़े नोट तो हैं, लेकिन अब वो किसी काम के नहीं रहे। बैंक से लेकर एटीएम के बाहर तक लगी लंबी कतारों के बीच बच्चों की गुल्लक ही ऐसा इकलौता रास्ता रह गई, जिससे लगभग कोटा के हर बाशिंदे के घर का खर्च चल रहा है।
सौ- पचास के नोट पहले खर्च होते हैं
पांच सौ और एक हजार के नोट बंद होने के बाद जब छोटे नोट की जरूरत पड़ी तो सबसे पहले बच्चों की गुल्लक में आस नजर आई। वीएमओयू के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुबोध अग्निहोत्री कहते हैं कि सामान्य तौर पर जेब में सौ- पचास के नोट होने पर सबसे पहले वही खर्च होते हैं। बड़े नोट की बंदी अचानक हुई, जिसके बाद एक-दो दिन में ही जेब में रखे छोटे नोट खर्च हो गए। बैंक या एटीएम से छोटे नोट नहीं मिल सके, मगर खर्च के लिए तो चाहिए ही थे।
रोजमर्रा की चीजें खरीदने के लिए तो छोटी करेंसी चाहिए
असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. पातांजलि मिश्रा कहते हैं कि बड़ा सामान तो मॉल से ले आए, लेकिन रोजमर्रा की चीजें खरीदने के लिए तो छोटी करेंसी ही चाहिए थी। ऐसे में बच्चों की गुल्लक का सहारा लेना पड़ा। गुल्लक फोडऩे के बाद छोटे नोटों और छोटी बचत का महत्व समझ में आ गया।
दूध, ब्रेड और बटर देने से मना कर दिया
कोटा विवि के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. घनश्याम शर्मा ने बताया कि नोट बंदी के बाद जैसे-तैसे पुराने नोट बदलवाए, लेकिन दुकानदार ने दो हजार रुपए का बड़ा नोट देखकर सुबह दूध, ब्रेड और बटर जैसी चीजें देने से साफ मना कर दिया। सब्जी और घरेलू जरूरतों का दूसरा सामान तक नहीं मिल रहा था। आखिरकार बेटे की गुल्लक फोड़ी और उससे निकले दस, बीस, पचास और सौ के नोट से घर का खर्च चलाना पड़ रहा है।
बड़े काम की गुल्लक
राष्ट्रीय बचत योजना के मुताबिक
-शहर में गुल्लकों की संख्या-10 हजार
-रुपए प्रति गुल्लक होने वाली बचत- 500 - 300
-गुल्लक की कुल बचत -40 लाख
Published on:
17 Nov 2016 02:22 pm
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