कोटा. बिरला जब विधायक बने तब उनके साथ ऐसा वाक्या हुआ कि वह पूरी रात सो न सके। आंखों में नींद थी पर दिमाग में कुछ ओर ही चल रहा था, जो उनकी नींद उड़ा रहा था। आंखें बंद करते तो वह दृश्य आंखों के सामने आ जाता। पूरी रात आंखों में कटी और जैसे ही सुबह हुई तो फैसला कर लिया कि अब कोई भी व्यक्ति किसी भी भूखा नहीं सोएगा। दरअसल, बिरला सर्दियों में जरूरतमंदों को कम्बल ओढ़ा रहे थे। इस दौरान एक व्यक्ति ने कहा बाबूजी दो दिन से खाना नहीं खाया है.., उस असहाय के शब्दों ने उन्हें रातभर सोने नहीं दिया। बिरला ने उसी रात को ठान ली थी कि जरूरतमंदों के लिए ऐसा काम करेंगे कि एक भी व्यक्ति रात को भूखा नहीं सोएगा।
दूसरे दिन ही जन सहयोग से ‘प्रसादम्Ó प्रकल्प शुरू कर किया। बिरला हमेशा से ही गरीबों की मदद कर मुख्य धारा में लाने के लिए प्रयासरत रहते हैं। आज बिरला की पहल पर शहर में सुबह-शाम गरीबों को भोजन कराया जाता है। बिरला ने निर्धनों के तन ढकने के लिए नि:शुल्क परिधान उपहार केन्द्र स्थापित किया, जो आज भी संचालित है। टेलर लगा रखे हैं जो जरूरतमंद के अनुसार कपड़े तैयार करते हैं। यह व्यवस्था आज भी बखूबी चल रही है और लाखों लोगों को इसका लाभ मिल रहा है। सुख-दुख में लोगों की मदद के लिए तैयार रहना और समस्याओं का समाधान के लिए प्रयासरत रहना ही जनता में उनकी लोकप्रियता की वजह बनी।
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संसद में खूब उठाई राजस्थान की आवाज
2014 में सांसद के रूप में कोटा-बूंदी क्षेत्र के संबंधित खूब सवाल उठाए। मुद्दों को उठाने में बिरला का नाम अग्रणी रहा। 2014 में हाड़ौती में भीषण ओलावृष्टि का मुद्दा बिरला ने उठाया था। इसके बाद तत्कालीन केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली कोटा आए।
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राजस्थान मूल के पहले लोकसभा अध्यक्ष होंगे बिरला
कभी कांग्रेस में राजस्थान के नेताओं की तूती बोलती थी, लेकिन अब भाजपा भी राजस्थान के नेताओं को लगातार मौका दे रही है। यही वजह है कि ओम बिरला को लोकसभा का अध्यक्ष बनाया गया है। बिरला राजस्थान मूल के पहले ऐसे नेता हैं, जो इस पद तक पहुंचे हैं। इससे पहले राजस्थान से लोकसभा का चुनाव लडऩे वाले बलराम जाखड़ भी लोकसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं, लेकिन वह मूलत: पंजाब के रहने वाले थे।
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बिरला को बूथ मैनेजमेंट का मास्टर माना जाता है और कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय नेताओं की श्रेणी में आते हैं। मोदी के पहले कार्यकाल में राजस्थान के पांच सांसद मंत्री रहे तो दूसरे कार्यकाल में उन्होंने पहली बार में ही तीन मंत्री बना दिए। तीन में से एक गजेन्द्र सिंह शेखावत को केबिनेट मंत्री का दर्जा ही नहीं दिया। बिरला को भी इतनी बडी जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिसके बारे में किसी ने कयास तक नहीं लगाया था।