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भाजपा के गढ़ में बाजी पलटने के लिए साथ आएंगे कांग्रेस के दिग्गज ?

दोनों ही पार्टियों में चरम पर है गुटबाजी..

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कोटा

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Rajesh Tripathi

Apr 05, 2019

kota news

भाजपा के गढ़ में बाजी पलटने के लिए साथ आएंगे कांग्रेस के दिग्गज ?

मरूधरा में दोनों ही प्रमुख दल मिशन-25 के लक्ष्य की रणनीति बनाकर काम कर रहें है। मध्यप्रदेश की सीमा से सटा हाड़ौती क्षेत्र आजादी के बाद से ही पहले जनसंघ और भाजपा का मजबूत गढ़ बना हुआ है। हाड़ौती की राजनीति में उस वक्त बड़ा बदलाव आया जब लम्बे समय से कांग्रेस में रहे राजपरिवार के सदस्य इज्यराज सिंह और पत्नी कल्पना देवी ने विधानसभा चुनावों में भाजपा का दामन थाम लिया। इसे कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना गया। इज्यराज 2009 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत कर सांसद बने थे। अब कांग्रेस के नेता यहां पर बाजी पलटने की बात कर रहें है वहीं भाजपा भी पार्टी के किले में जीत के प्रति आश्वस्त नजर आ रही है।


दिग्गजों की भरमार लेकिन चरम पर गुटबाजी
भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों में यहां दिग्गजों की भरमार है लेकिन दोनों ही पार्टी गुटबाजी से जूझ रही है। भाजपा के कई पूर्व विधायक टिकट चयन पर नाराजगी जता चुके हैं वहीं कांग्रेस के कद्दावर नेता भी एक-दूसरे से दूरी बनाकर ही रखते हैं। ऐसे में अगर कांग्रेस यहां कुछ चमत्कार दिखाना चाहती है तो जरूरी है कि कैबिनेट मंत्री शांति
धारीवाल, पूर्व मंत्री भरत सिंह सहित तमाम बड़े नेताओं को साथ आकर मजबूती से चुनाव लडऩा होगा।


राजनीतिक समीकरण
कोटा-बूंदी लोकसभा क्षेत्र में कोटा के अलावा बूंदी जिले का कुछ हिस्सा आता है। आजादी के बाद इस सीट पर हुए कुल 16 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस मात्र 4 बार ही इस सीट पर जीत दर्ज कर पाई, जबकी 6 बार भाजपा और 3 बार भारतीय जनसंघ का कब्जा रहा, वहीं 1 बार जनता पार्टी, 1 बार भारतीय लोकदल और 1 बार निर्दलीय का कब्जा रहा। 1952 में हुए पहले आम चुनाव में रामराज्य परिषद से राज चंद्रसेन ने जीत का परचम लहराया तो, 1957 में कांग्रेस से ओंकार लाल ने बाजी मारी। इसके बाद 1962, 1967 और 1971 में इस सीट पर जनसंघ का कब्जा रहा। 1977 की जनता लहर में इस सीट पर जनसंघ पृष्ठभूमि के बीएलडी उम्मीदवार कृष्ण कुमार गोयल ने जीत दर्ज की, 1980 में उन्होंने जनता पार्टी के टिकट पर इस सीट पर कब्जा जमाया।

1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के शांति धारीवाल जीते, तो 1989 में भाजपा के दिवंगत नेता दाऊदयाल जोशी ने यह सीट कांग्रेस से छीन ली। इसके बाद दाऊदयाल जोशी 1996 तक लगातार तीन बार यहां के सांसद बन। वहीं 1998 में कांग्रेस रामनारायण मीणा ने यह सीट हथिया ली। लेकिन 1999 में रघुवीर सिंह कौशल ने मीणा को हराकर यहां कब्जा कर लिया। 2004 में रघुवीर सिंह कौशल ने दोबारा जीत दर्ज की लेकिन 2009 के चुनाव में कोटा राजघराने के इज्यराज सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर पार्टी को जीत दिलाई। वहीं 2014 में राजस्थान भाजपा के कद्दावर नेता ओम बिरला ने सिंह को हराकर एक बार फिर इस सीट पर भाजपा की जीत का परचम लहराया।

जातिगत समीकरणों के चलते कांग्रेस ने बदली गाइडलाइन
हाड़ौती का यह क्षेत्र कृषि के लिहाज से उपजाऊ है और अनाज की सबसे बड़ी रामगंज मंडी यहीं पर स्थित है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक यहां की जनसंख्या 27,16,852 है, जिसका 49.27 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण और 50.73 प्रतिशत हिस्सा शहरी है. वहीं कुल आबादी का 20.4 फीसदी अनुसूचित जनजाति और 12.76 फीसदी अनुसूचित जाति हैं। मीणा वोटरों की भारी तादाद होने और इज्यराज सिंह के भाजपा में शामिल होने के बाद मजबूरी में कांग्रेस ने पार्टी की गाइडलाइन तोड़कर पीपल्दा के विधायक रामनारायण मीणा को यहां से टिकट दिया है।

कोटा संसदीय सीट के अंतर्गत 8 विधानसभा सीटों में कोटा जिले की कोटा उत्तर, कोटा दक्षिण, लाडपुरा, सांगोद, पीपल्दा, रामगंज मंडी विधानसभा और बूंदी जिले की केशोरायपाटन और बूंदी विधानसभा सीट शामिल है। विधानसभा चुनावों में भाजपा ने यहां की 5 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की जबकि कांग्रेस ने पीपल्दा, सांगोद और कोटा उत्तर सीट पर कब्जा जमाया है। इस लिहाज इस लोकसभा चुनाव में भाजपा का पलड़ा भारी है।