
मुस्लिम कैलेंडर के मुताबिक शाबान माह की 14 तारीख को शब-ए-बरात मनाई जाती है। शब-ए-बारात दो शब्दों, शब और बारात से मिलकर बना है, जहां शब का अर्थ रात से है वहीं बारात का मतलब बरी होना है।
इस्लामी कैलेंडर के अनुसार यह रात साल में एक बार शाबान महीने की 14 तारीख को सूर्यास्त के बाद शुरू होती है। मुसलमानों के लिए यह रात बेहद फजीलत (महत्वपूर्ण) रात मानी जाती है, इस दिन विश्व के सारे मुसलमान अल्लाह की इबादत करते हैं। वे दुआएं मांगते हैं और अपने गुनाहों की तौबा करते हैं।
मुफ्ती शमीम अशरफ ने बताया कि इबादत, तिलावत और सखावत (दान-पुण्य) के इस त्योहार पर मस्जिदों और कब्रिस्तानों में खास सजावट की जाती है। मस्जिदों व घरों पर विशेष रोशनी की जाती है। वहीं, बुजुर्गों व अजीजों की कब्रों पर चिरागा कर दुरूद और दुआओं के साथ इसाल-ए-सवाब पेश किया जाता है। उन्होंने कहा कि इस रात मुस्लिमजन अपने उन परिजनों, जो दुनिया से रूखसत हो चुके हैं, उनकी मगफिरत की की दुआएं की जाती है।
यह अरब में लैलतुल बराह या लैलतुन निसफे मीन शाबान के नाम से जाना जाता है। जबकि, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, अफगानिस्तान और नेपाल में यह शब-ए-बारात के नाम से जाना जाता है।
यह हैं 4 मुकद्दस रातें
शब ए बारात इस्लाम की 4 मुकद्दस रातों में से एक है। जिसमें पहली आशूरा की रात दूसरी शब-ए-मेराज, तीसरी शब-ए-बारात और चौथी शब-ए-कद्र होती है।
Published on:
12 May 2017 11:03 am
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