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प्रथम विश्व युद्ध से करगिल तक ‘उमर’ की 4 पीढ़ियों ने दुश्मनों पर बरपाया कहर, जानिए भारतीय सेना में ‘उमर’ का योगदान

भारतीय सेना में सबसे ज्यादा जवान देने का श्रेय हासिल करने वाले राजस्थान के जिलों में शामिल कोटा संभाग का बूंदी जिले का सैन्य इतिहास हमेशा गौरवान्वित करता रहा है।

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कोटा

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Zuber Khan

Jan 26, 2020

Republic Day

प्रथम विश्व युद्ध से करगिल तक 'उमर' की 4 पीढिय़ों ने दुश्मनों पर बरपाया कहर, पढि़ए, भारतीय सेना में 'उमर' का योगदान

नागेश शर्मा/चंद्रप्रकाश योगी @ बूंदी. पेच की बावड़ी.

भारतीय सेना में सबसे ज्यादा जवान देने का श्रेय हासिल करने वाले जिलों में शामिल कोटा संभाग का बूंदी जिले का सैन्य इतिहास हमेशा गौरवान्वित करता रहा है। 1914 के प्रथम युद्ध से यहां के युवा सेना में भर्ती होना शुरू हुए थे और आज भी यह सिलसिला जारी है। हम बात कर रहे हैं बूंदी के उमर गांव की। यह गांव फौजियों के गांव के नाम से प्रसिद्ध है। इस गांव ने प्रथम विश्व युद्ध से अब तब 500 से ज्यादा जांबाज देश को दिए हैं।

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हाइवे 52 से करीब 4 किलोमीटर दूर स्थित उमर गांव, जिसकी फौजियों का गांव के नाम से पहचान कायम हो गई। चाहे प्रथम, द्वितीय विश्व युद्ध हो या फिर करगिल की लड़ाई... बूंदी जिले के इस गांव के जांबाज पीछे नहीं हटे। कुछ तो मातृभूमि की रक्षा करते शहीद भी हुए। जिले में उमर एक ऐसा गांव होगा, जिसकी चौथी पीढ़ी फौज में पहुंच गई।

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जानकारों की मानें तो उमर गांव से अब तक करीब 500 से अधिक सैनिक सेना में रहकर दुश्मनों को जंग में हरा चुके। गांव के दो सैनिक वर्ष 1965 के युद्ध में रघुनाथ मीणा जम्मू क्षेत्र और वर्ष 2000 में वीर बहादुर जगदेवराज सिंह बिहार में शहीद हुए। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान गांव के करीब 25 सैनिकों ने अलग-अलग जगहों पर दुश्मनों से लोहा मनवाया। उमर से भारतीय सेना में 12 कैप्टन, 15 सूबेदार, 8 नायब सूबेदार सहित हवलदार और दर्जनों सिपाही देश की सीमा के प्रहरी रह चुके। उमर गांव में प्रत्येक घर से तीन से चार जने सेना में बताए।?फौज से रिटायर्ड होकर आए लोगों के सुनाए किस्से आज भी रोंगटे खड़े कर देते हैं।?इनकी सुनाई सच्चाई लोगों को सिर्फ फिल्मों में दिखती है।

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आंकड़े बयां करते जांबाजी की कहानी
उमर के 14 सैनिकों ने प्रथम विश्व युद्ध में भाग लिया। द्वितीय विश्व युद्ध में 25 एवं वर्ष 1971 की लड़ाई में 20 सैनिकों ने भाग लिया।

चार पीढिय़ां देश सेवा में
1. उमर के रूगा हवालदार ने प्रथम विश्वयुद्ध में जंग लड़ी। बाद में रूगा का बेटा श्रीलाल मीणा आजाद हिंद फौज में गार्ड कमांडर रहा। उसने द्वितीय विश्व युद्ध लड़ा। तीसरी पीढ़ी में कैप्टन देवीसिंह मीणा जिन्होंने 1971 के युद्ध में भाग लिया। चौथी पीढ़ी में देवीसिंह मीणा का पुत्र अर्जुन मीणा जो 14 साल से पाक बोर्डर पर हवलदार बनकर तैनात है।

2. उमर के छोगा सिंह ने प्रथम विश्वयुद्ध लड़ा। वे सिपाही थे। इसके बाद बेटा हरनाथ मीणा फौज में भर्ती हुआ। इसके बाद हरनाथ का बेटा जगदेव सिंह सैनिक बना, जो वर्ष 2000 में बिहार में शहीद हो गए। इसके बाद जगदेव का बेटा देवराज मीणा सीआरपीएफ में भर्ती हो गया। वह सात साल से फौज में है। जगदेव का एक बेटा आईआईटी कर रहा है। तीन बेटियां पढ़ाई कर रही हंै। उनकी मां कमला देवी आज भी गांव के युवाओं को फौज में जाने के लिए प्रेरित करने से पीछे नहीं हटती।

3. उमर के गणेशराम मीणा ने द्वितीय विश्व युद्ध लड़ा। फिर बेटा कानाराम मीणा फौज में हवलदार रहे। तीसरी पीढ़ी में जगदीश मीणा, हरचंद मीणा एवं प्रभुलाल मीणा फौज में भर्ती हुए। अब चौथी पीढ़ी में शिवप्रकाश मीणा और प्रवीण कुमार फौज में भर्ती हो गए।?