
केशवरायपाटन. अतिशय क्षेत्र में चल रहे चातुर्मास प्रवचनों की श्रृंखला में शनिवार को गणिनी आर्यिका स्वस्ति भूषण ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से यह प्रश्न करना चाहिए कि वह क्यों जी रहा है। उन्होंने बताया कि अधिकांश लोग परिवार, बच्चों या मृत्यु के भय के कारण जीवन जीते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि जीव का स्वभाव ही जीना है। शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर है। शरीर और आत्मा के पृथक होने को ही मृत्यु कहते हैं, आत्मा का कभी नाश नहीं होता। गणिनी आर्यिका ने कहा कि जैसे अग्नि का स्वभाव उष्णता है, जल का शीतलता और वायु का बहना है, उसी प्रकार आत्मा का स्वभाव जीना है। मृत्यु संसार का सबसे बड़ा कष्ट है, इसलिए किसी भी जीव को कष्ट देना, हिंसा करना अथवा उसके प्राण हरना अनुचित है। उन्होंने सम्यग्दर्शन की चर्चा करते हुए उसके बाह्य व अभ्यंतर आधार बताए। बाह्य आधार त्रस नाड़ी है, जबकि अभ्यंतर आधार भव्य जीव है। सम्यग्दर्शन की प्राप्ति केवल भव्य जीव को ही होती है। आर्यिका ने आत्मस्वरूप की पहचान कर अहिंसा, आत्मचिंतन एवं सम्यग्दर्शन की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश दिया।
Updated on:
02 Aug 2026 06:02 am
Published on:
02 Aug 2026 06:02 am
