
तीन साल से नहीं हुआ एक भी आयोजन
अपना पेट काटकर रंगमंच को जिंदा रखने की कोशिशें रंगकर्मियों के शहर में दम तोडऩे लगी हैं। कला को बढ़ावा देने के लिए नगर विकास न्यास ने शहर के बीचों-बीच आलीशान ऑडिटोरियम तो बना दिया, लेकिन मंहगे किराए के कारण कलाकारों की पहुंच से बाहर हो गया। रंगकर्मी किराया कम करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन नगर विकास न्यास कमाई का कोई भी मौका गंवाने को तैयार नहीं।
शरद तेलंग, उदयमणि कौशिक और राजेंद्र पांचाल जैसे नामचीन रंगकर्मियों के शहर में तीन साल पहले तक एक भी ऐसा ठिकाना नहीं था, जहां कलाकार अपने हुनर का मुजाहिरा कर सकें।
सड़क से लेकर संसद तक रंगकर्मियों ने संघर्ष किया तो नगर विकास न्यास ने वर्ष 2012 में बालाजी मार्केट के पीछे ऑडिटोरियम बनाने का फैसला किया। वर्ष 2013 में 12 करोड़ की लागत से बनकर तैयार हुए इस आलीशान ऑडिटोरियम के दरवाजे तो खुल गए, लेकिन रंगकर्मियों के बजाय व्यवसायिक गतिविधियों के लिए।
कला को प्रोत्साहित करने के नाम पर बनाई गई इस इमारत से यूआईटी ने पहले दिन से ही कमाई करने की ठान ली। नतीजन, ऑडिटोरियम में एक दिन का कार्यक्रम आयोजित करने के लिए 70 हजार रुपए की मोटी रकम मांगी जाने लगी।
पाई-पाई जोड़कर कला को जिंदा रखने की जद्दोजहद में जुटे कलाकारों के लिए इसे दे पाना नामुमकिन हो गया। जिसके चलते बीते तीन साल में इस जगह एक भी नाटक का मंचन नहीं हो सका है।
नहीं मिलती कोई रियायत
रंगकर्मियों के लिए देश भर में बने रंगमंच खास मौकों पर मुफ्त में मुहैया कराए जाते हैं। बाकी दिनों में रियायती किराया वसूला जाती है। दूसरे राज्यों की बात तो छोडि़ए जयपुर के ही बिड़ला ऑडिटोरियम में रंगकर्मियों को रियायत दी जाती है। इतना ही नहीं राजधानी में होने के बावजूद बिड़ला ऑडिटोरियम का किराया महज 50 हजार रुपए ही है।
कोटा ऑडिटोरियम से पूरे 20 हजार रुपए कम। 27 मार्च को विश्वरंगमंच दिवस के मौके को खास बनाने के लिए रंगकर्मियों ने यूआईटी से कम किराए पर ऑडिटोरियम देने की मांग की, लेकिन आला अफसर इस बार भी नहीं पसीजे। किराए में धेला भर भी कम करने से साफ इन्कार कर दिया। जिसके बाद निराश रंगकर्मियों ने कलादीर्घा के पास बने छोटे से रंगमंच पर अपना सालाना जलसा आयोजित करने का फैसला किया है।
पाई-पाई जोड़ कर आगे बढ़ा रहे हैं कला
रंगकर्मियों के लंबे संघर्ष के बाद ऑडिटोरियम बना, लेकिन कलाकारों के लिए ही इसके दरवाजे बंद कर दिए गए। पाई-पाई जोड़कर जैसे-तैसे कला को आगे बढ़ाने के लिए मंचन करते हैं। ऐसे में कलाकार 70 हजार रुपए का बंदोबस्त कहां से कर पाएगा। विश्व रंगमंच दिवस के मौके पर तो कम से कम ऑडिटोरियम मुफ्त में देना चाहिए।
रजनीश राहुरे, रंगकर्मी
रंगकर्मियों की समस्या वाजिब है। कुछ दिन बाद यूआईटी ट्रस्ट की बैठक होने वाली है उसमें इस मु²े को रखा जाएगा। कोशिश होगी कि कलाकारों को ऑडिटोरियम किफायती दामों पर मिल सके।
रामकुमार मेहता, चेयरमैन, यूआईटी
Published on:
08 Feb 2017 05:03 pm
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