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न्यूनतम मजदूरी को तरस रही महिला कुक

स्कूलों व मदरसों में बनाती हंै पोषाहार

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सांगोद. सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों की मिड डे मील की थाली का स्वाद भले ही दिन-प्रतिदिन बदल रहा हो लेकिन सांगोद ब्लॉक में पोषाहार बनाने में जुटी पांच सौ से अधिक महिला कुक आज भी न्यूनतम मजदूरी को तरस रही हैं। विभाग की ओर से एक दशक से बतौर मेहनताना उन्हें एक हजार रुपए प्रतिमाह ही दिया जा रहा है। इस राशि में उन्हें घर खर्च चलाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ाने, उपस्थिति में वृद्धि, ड्रोप आउट रोकने, शिक्षा के स्तर को बढ़ाने आदि के उद्देश्य से अगस्त 1995 से मिड डे मील योजना शुरू की गई थी। इसके तहत शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र के सभी सरकारी स्कूलों के साथ ऐसे मदरसों के कक्षा पहली से आठवीं तक के विद्यार्थियों को भी मध्यांतर में पोषाहार मुहैया करवाया जा रहा है जहां पैराटीचर का पद स्वीकृत है।

सब काम इन्हीं के जिम्मे

पोषाहार पकाने के लिए विभाग ने विद्यार्थी संख्या से लिहाज से कुक लगाए हुए हैं। इन्हें विभाग ने कुक कम हेल्पर का नाम दिया हुआ है। पोषाहार बनाने से लेकर बर्तनों की सफाई हो या रसोईघर की सफाई सब काम इन्हीं के जिम्मे हैं। कई बार तो पोषाहार सामग्री भी इन्हें ही लानी पड़ती है। इस काम में उन्हें स्कूलों में सुबह से शाम हो जाती है।

यह है पोषाहार का मीनू

योजना में पहली से पांचवीं तक के विद्यार्थियों को 450 ग्राम कैलोरी तथा करीब 12 ग्राम प्रोटीन तथा कक्षा छठी से आठवीं तक 700 ग्राम कैलोरी व 20 ग्राम प्रोटीन उपलब्ध कराया जाता है। इसके लिए स्कूलों में पोषाहार का मीनू भी तय है। सोमवार को रोटी सब्जी, मंगलवार को दाल-चावल, बुधवार को रोटी-दाल, गुरुवार को खिचड़ी, दाल-चावल, शुक्रवार को रोटी-दाल व शनिवार को रोटी सब्जी के साथ सप्ताह में एक बार फल खिलाए जाते हैं।

फसल कटाई से भी कम मेहनताना

कुक कम हेल्परों को जो मेहनताना मिलता है, वह न्यूनतम मजदूरी 180 रुपए प्रतिदिन से भी कम है। गांव में मजदूरी या फसल कटाई भी करें तो 200 से 250 रुपए प्रतिदिन मिल जाते हैं। जबकि इन्हें महज एक हजार रुपए मासिक मजदूरी मिलती है। उसमें भी अवकाश का पैसा काटा जाता है।