
शैक्षणिक नगरी में 20 फीसदी स्टूडेंट्स डिप्रेशन का शिकार, नहीं कह पाते मन की बात इसलिए उठाते हैं आत्महत्या जैसे कदम।
डिप्रेशन या मानसिक तनाव के लिहाज से शैक्षणिक नगरी कोटा का स्वास्थ्य कोई सुखद नहीं है। वजह है देश के कोने कोने से यहां पढऩे आए छात्रों में व्याप्त तनाव। कई छात्र तो आत्महत्या जैसा कदम तक उठा लेते हैं। आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले पांच साल में 87 स्टूडेंट्स डिप्रेशन के चलते आत्महत्या कर चुके हैं।
इसी के चलते इन दिनों कोटा भाभा अनुसंधान केन्द्र, मुम्बई से एक टीम कोटा आई हुई है। टीम यहां स्टूडेंट्स में तनाव के कारणों को लेकर विस्तृत अध्ययन कर रही है। इधर, डब्ल्यूएचओ की थीम से इत्तेफाक रखते हुए ही कोटा के मनोचिकित्सकों का भी कहना है कि तनाव ग्रस्त छात्र या व्यक्ति कैसे भी करके अपनी भावनाओं को शेयर जरूर करें। किसी को ना बता पाएं तो लिख दें किसी कागज पर।
दुनियाभर में बुरे हाल
विश्व में डिप्रेशन के मरीजों की संख्या हर वर्ष बढ़ रही। इसी चिंता के चलते विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस वर्ष विश्व स्वास्थ्य दिवस की थीम 'डिप्रेशन -लेट्स टॉकÓ रखी है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक पूरे विश्व में 30 करोड़ लोग डिप्रेशन का शिकार हैं। भारत में हर दस व्यक्तियों में से एक डिप्रेशन का शिकार है।
ये दो प्रमुख कारण
पढ़ाई : जो बच्चे कोटा आते हैं, वे अपने जिले के टॉपर आते हैं। कोटा आते ही उन्हें अपने जैसे सैकड़ों बच्चे मिलते हैं और वे कम्पीट नहीं कर पाते। इस कारण पढ़ाई का तनाव शुरू हो जाता है।
पेरेंट्स प्रेशर : ऑनलाइन रिजल्ट का तुरंत पेरेंट्स को पता चल जाता है। वे बच्चों को कॉन्फिडेंस में लेने की बजाय बच्चे की पढ़ाई के प्रति गंभीरता को ही कठघरे में खड़े कर देते हैं।
एेसे बचें तनाव से
सबसे जरूरी है जिदंगी को हंसकर जीएं, तभी तनाव दूर होगा। बच्चा पढऩे के साथ-साथ कोई भी एक खेलकूद एक्टिविटी चुन ले और रोज बाहर निकले। खेलकूद तो लगभग इनका बंद सा ही हो जाता है। डांस, योगा, मेडिटेशन, एरोबिक्स जैसी एक्टिविटी में भी भाग लें। किसी से कुछ नहीं कह पा रहे हैं तो लिखकर उस बात को व्यक्त करें।
डॉ. चंद्रशेखर सुशील, मनोचिकित्सक
दोस्तों को सबसे पहले डिप्रेशन का पता चलता है। वे टीचर या पेरेंट्स से ऐसी कोई बात साझा करें। रिजल्ट आ चुका हो या आने वालो हो, ऐसे समय में सभी खास ध्यान रखें। यदि नहीं पढऩा तो बेबाक पेरेंट्स को बोल दें....'मैं नहीं कर पाऊंगा।
डॉ. देवेन्द्र विजयवर्गीय, मनोचिकित्सक
Published on:
07 Apr 2017 09:05 am
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