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पिछले 65 सालों से यह मुस्लिम शख्स सिलता है रामलीला के पात्रों के कपड़े

लखीमपुर के रहने वाले मुन्ने मियां पिछले 65 सालों से रामलीला के पात्रों के कपड़े सिलकर सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश देते हैं

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पिछले 65 सालों से यह मुस्लिम शख्स सिलता है रामलीला के पात्रों के कपड़े

लखीमपुर खीरी. देश में आज भी हिंदू-मुस्लिम की बातें आम बात है। लेकिन इन सबसे अलग लखीमपुर के रहने वाले मुन्ने मियां पिछले 65 सालों से रामलीला के पात्रों के कपड़े सिलकर सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश देते हैं। मुन्ने मियां वैसे तो इस्लाम धर्म के हैं लेकिन मजहब से अलग ये भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता के कपड़े रामलीला के पात्रों के लिए बनाकर इस बात का संदेश देते हैं कि आपसी एकता मजहब से भी बड़ी होती है।

मुन्ने मियां पिछले 65 सालों से यह काम कर रहे हैं। हालांकि, अब वे काफी बुजुर्ग हो चुके हैं इसलिए उन्होंने अपना काम अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंपा है। देखा जाए, तो यह एक तरह से सहयोग ही है। मुन्ना मियां नगर में होने वाली इस ऐतिहासिक रामलीला में केवल पात्रों के कपड़े ही नहीं सिलते। रामलीला तक अपना काम पूरा कर लेने के बाद भी वह रामलीला के अंतिम दिन तक रुके रहते हैं और मथुरा भवन से रामलीला मैदान तक पात्रों के साथ जाते भी हैं। जब रामलीला शुरू होती है, तो आयोजकों को हर बार मुन्ने मियां याद आते हैं। क्योंकि मुन्ने मियां पिछले 65 वर्षों से रामलीला के माध्यम से सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बने हुए हैं। यह भगवान राम, लक्ष्मण, भरत,शत्रुघ्न, गुरु वशिष्ठ, राजा दशरथ, देवऋषि नारद, लंकापति महाराज रावण, कुंभकरण, मेघनाथ और सभी पात्रों के कपड़े उनकी खूबसूरत डिजाइनिंग तैयार करते में महारथ हासिल है।

अपने भतीजे को सौंप दी कमान

मियां बताते हैं कि वह 10 साल के थे, जब अपने पिता के साथ यहां आए थे। तब मुन्ने मियां के पिता नवाब अली यहां कपड़े सिला करते थे। करीब तीन से चार साल काम करने के बाद यह काम पिता से उन्होंने ने संभाला लिया। लेकिन अब 80 वर्ष के हो रहे मुन्ने मियां कमजोर हो गए हैं। अब यह विरासत अपने भतीजे अली अहमद को दे रहे हैं। उनका कहना है कि धर्म महान है। रामलीला के कपड़े और सामान्य कपड़ों में बारीकी समझनी होती है। इसलिए अब वह यह काम अपने भतीजे को सौप रहे हैं।