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Makar Sankranti 2026: जब दूर रहकर भी साथ मनाई गई मकर संक्रांति- प्यार, पतंग और वीडियो कॉल की कहानी

Makar Sankranti 2026: अब तो मस्ती भी ऑनलाइन हो गई है। वर्चुअल पतंगबाजी के ऐप्स और गेम्स के जरिए लोग एक-दूसरे के साथ खेल रहे हैं। कहीं असली छत नहीं, लेकिन स्क्रीन पर ही “वो काटा” की आवाज गूंज जाती है।

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भारत

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Pratiksha Gupta

Jan 14, 2026

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Video Call Par Makar Sankranti | (फोटो सोर्स- GeminiAI)

Makar Sankranti 2026: त्योहार खुशियों का नाम हैं, लेकिन जब अपने लोग पास न हों तो वही त्योहार थोड़े अधूरे से लगने लगते हैं। मकर संक्रांति भी कुछ ऐसी ही होती है। घर की छत, आसमान में उड़ती पतंगें, तिल-गुड़ की मिठास और परिवार की हंसी। ये सब मिलकर ही त्योहार को पूरा बनाते हैं। मगर आज के दौर में पढ़ाई, नौकरी और जिम्मेदारियां लोगों को एक शहर से दूसरे शहर या देश से बाहर ले गई हैं। ऐसे में सवाल उठता है क्या दूरी त्योहारों की खुशी छीन सकती है? जवाब है, नहीं।

Makar Sankranti 2026: ऑनलाइन मना सकते हैं अपनों संग त्योहार

ऑनलाइन गिफ्ट डिलीवरी भी अब रिश्तों का अहम हिस्सा बन चुकी है। तिल-गुड़ के लड्डू, पतंगों का पैकेट या कोई छोटा सा सरप्राइज जब दूर बैठे किसी अपने के घर पहुंचता है, तो उसे लगता है कि सामने वाला शख्स वहीं मौजूद है। ये सिर्फ एक तोहफा नहीं होता, बल्कि भरोसे और प्यार का इजहार होता है। डिजिटल दौर में भी कुछ चीजें दिल को खास छूती हैं। जैसे हाथ से लिखा हुआ पत्र या कार्ड। मोबाइल मैसेज की भीड़ में कागज पर लिखे शब्द आज भी अलग एहसास देते हैं। उसमें बीते त्योहारों की यादें और साथ मनाने के वादे रिश्तों को और गहरा बना देते हैं।

अब तो मस्ती भी ऑनलाइन हो गई है। वर्चुअल पतंगबाजी के ऐप्स और गेम्स के जरिए लोग एक-दूसरे के साथ खेल रहे हैं। कहीं असली छत नहीं, लेकिन स्क्रीन पर ही “वो काटा” की आवाज गूंज जाती है। कई लोग एक ही समय पर एक जैसा खाना बनाकर वीडियो कॉल पर साथ बैठकर खाते हैं। दूरी वहीं रह जाती है, एहसास साथ होने का हो जाता है।

Makar Sankranti 2026: एक कहानी ऐसी भी

इसी बदलते समय की एक झलक है अदिति और ईशान की कहानी। अदिति बेंगलुरु में थी और ईशान काम के सिलसिले में लंदन में। मकर संक्रांति पर घर और अपनों की कमी साफ महसूस हो रही थी। लेकिन दोनों ने तय किया कि इस बार भी त्योहार साथ मनाया जाएगा। वीडियो कॉल पर दो अलग-अलग किचन एक हो गए। खिचड़ी बनी, तिल के लड्डू आए और फिर शुरू हुई वर्चुअल पतंगबाजी। हंसी, नोकझोंक और पुरानी यादों ने दूरी को कमजोर कर दिया।

दिन के अंत में अदिति को एहसास हुआ कि त्योहार एक जगह होने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए वक्त निकालने से खास बनते हैं। जैसे पतंग की डोर कितनी भी लंबी हो, हाथ से जुड़ी रहती है वैसे ही रिश्ते भी जुड़े रहते हैं, बस भरोसे की डोर थामी रहनी चाहिए।

डिस्क्लेमर- इस लेख में दी गई अदिति और ईशान की कहानी काल्पनिक है। जिसे टेक्नोलॉजी के महत्त्व को समझाने के लिए पेश किया गया है।

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