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उप्र में फेफड़ों की बीमारी में 46 फीसद का इजाफा, प्रदूषण है सबसे बड़ा कारण

कई बार लोग इसे हल्के में लेते हैं, जिससे कि आगे चलकर उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है।  

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उप्र में फेफड़ों की बीमारी में 46 फीसद का इजाफा, प्रदूषण है सबसे बड़ा कारण

लखनऊ. उत्तर प्रदेश फेफड़ों की बीमारी यानी पल्मोनरी डिजीज का घर बन गया है। यहां फेफड़ों संबंधी बीमारी के मरीजों में 46 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। इसकी खास वजह आधुनिक जीवनशैली और भागदौड़ भरी जिंदगी है। इसकी वजह से खानपान का ध्यान न रखने से लोगों की सेहत प्रभावित हो रही है। हालांकि, टेक्नोलॉजी की मदद से अब हर बीमारी का इलाज संभव है। फिर भी उप्र में इसके मरीजों की तादाद बढ़ती ही जा रही है। एक आंकड़े के मुताबिक 2016 में उप्र में 98.6 लाख लोग फेफड़ों की बीमारी से ग्रसित पाए गए थे। हैरानी की बात यह है कि बीमारी साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक उप्र में 1990 से लेकर 2016 तक फेफड़ों के मरीजों की संख्या में 46 फीसदी तक इजाफा हुआ है। इसका प्रमुख कारण है वायु प्रदूषण।

भारत के जनसंख्या स्वास्थ्य फाउंडेशन द्वारा 2017 में कराए गए एक अध्ययन में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में सीओपीडी यानी फेफड़ों की बीमारी मौत का प्रमुख कारण है। लैंसेट अध्ययन में बताया गया कि 2016 में भारत में सीओपीडी के लिए प्रमुख जोखिम कारण वायु प्रदूषण है। सीओपीडी यानी पल्मोनेरी डिजीज से प्रभावित मरीजों की संख्या दुनियाभर में सबसे ज्यादा है।

ऐसे बढ़ी साल दर साल तादाद

1990 में पल्मोनरी डिसीस के 4,004 केसेस थे

2004 में इस संख्या में 5.1 फीसदी इजाफा हुआ

2015 में इस संख्या में 22 फीसदी बढ़ोतरी हुई

2016 तक इस संख्या में 46 फीसदी इजाफा हुआ

वायु प्रदूषण सबसे प्रमुख कारण

केजीएमयू के डॉक्टर अजय वर्मा ने बताया कि पल्मोनरी डिसीज घातक बीमारी का रुप ले सकता है। कई बार लोग इसे हल्के में लेते हैं, जिससे कि आगे चलकर उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि हर साल फेफड़ों के रोगी के मरीजों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। आजकल जहां टेक्नोलॉजी के माध्यम से लगभग हर बीमारी का इलाज संभव है, वहीं कुछ केसेस में ऐसी बीमारियों का इलाज करने में टेक्नोलॉजी भी फेल है। उनका कहना है कि स्मोकिंग, वायु प्रदूषण और संक्रमण इसका प्रमुख कारण होते हैं। लेकिन, जिस तरह से पल्मोनरी डिसीस के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है, उससे लगता है कि भविष्य में इसके रोगियों की संख्या और बढऩे के आसार हैं। इसके अलावा खाना बनाने वाले बर्तन भी फेफड़ों को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। लकड़ी, केरोसिन और भट्टी पर खाना बनाने वाली महिलाओं में सांस लेने की समस्या बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि लगभग 30 फीसदी शहरी महिलाएं इस एक कारण से बीमारी की चपेट में आती हैं।
ठंड में बढ़ जाती है बीमारी
केजीएमयू के पल्मोनरी विभाग के डॉक्टर सूर्यकांत ने बताया कि इस बीमारी से हर साल पांच लोगों की मौत होती है। केजीएमयू के ओपीडी में ही हर साल 400-500 मरीज आते हैं। लेकिन इन सबमें वायु प्रदूषण से प्रभावित वालों की संख्या ज्यादा रहती है। सर्दी में यह समस्या और भी बढ़ जाती है। स्मॉग होने से सांस लेने में दिक्कत शुरू हो जाती है।
इस तरह करें बचाव
हालांकि, फेफड़ों के मरीजों की संख्या बढ़ रही है लेकिन टीकाकरण से इसका बचाव संभव है। डॉ. सूर्यकांत ने बताया कि सांस रोगियों के लिए इन्फ्लुएंजा का टीका है। यह साल में एक बार लगाया जाता है, जिससे कि सांस की गंभीर बीमारी को रोका जा सकता है। वहीं सांस लेने की तकलीफ से ज्यादा जरूरी है कि प्रदूषण और धूम्रपान से बचें। साथ ही घर से निकलते वक्त मुंह ढककर निकलें।