
करिश्मा लालवानी
लखनऊ. कहते हैं कि किताबी कीड़ा बन कर कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। अगर समझदार बनना है, तो किताबों के ज्ञान से नहीं बल्कि इससे ऊपर उठ कर कुछ सीखना चाहिए। कुछ इसी तरह का ज्ञान लखनउवाइट्स को दिया अभिनेता विवियन डीसेना ने। वे लखनऊ के एम.वी मीडिया इंस्टीट्यूट में हुए कार्यक्रम में शामिल हुए और स्टूडेंट्स को कई टिप्स दिए। कार्यक्रम में संस्थान की डायरेक्टर शिवानी त्रिवेदी समेत संजय दत्त की फिल्म भूमि के प्रोड्यूसर और मात्रछाया (सामाजिक संस्था) के संस्थापक मनीष सिंह मौजूद थे। इस दौरान छात्र और छात्राओँ ने भी विवियन से खुलकर बातचीत की और टीवी की दुनिया में आने के लिए क्या स्ट्रैटेजी होनी चाहिए इस पर बात की।
पढ़ें इंटरव्यू-
सवाल-बच्चों को लिए एक्टिंग करियर कितना सुरक्षित है?
जवाब- सिर्फ एक्टिंग ही नहीं बल्कि बच्चे आजकल हर फील्ड में समय से पहले आगे बढ़ रहे हैं। अगर टैलेंट है, तो फिर चाहे टीवी हो या कोई और फील्ड इससे कोई मतलब नहीं पड़ता। आप जिस भी फील्ड में हों, वहां बस अपना बेस्ट दें। हांं, यहां ये जरूरी है देखना कि आप अपने स्ट्रगल को कैसे लेते हो। उससे कुछ सीखते हो या फिर हार मान जाते हो।
स्ट्रगल पीरियड मुश्किल जरूर होता है, लेकिन यही वो समय होता है जब आपको अपनी क्षमता साबित करनी होती है। या तो आप हार मान कर वापस लौट जाते हैं या फिर निरंतर प्रयास कर आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं। यही वो समय होता है जब आपकी ग्रोथ होती है।
सवाल- भारत में गेम ऑफ थ्रोन्स जैसे शो क्यों नहीं बनते?
जवाब- एम.वी इनस्टीट्यूट के छात्र ने जब ये सवाल विवियन से पूछा, तो इसका जवाब विवियन ने कुछ इस अंदाज में दिया। भारत में हम अपना खाना खाते हैं। जैसे दाल चावल, रोटी सब्जी। उसी तरह विदेश में लोग अपने तरह का खाना खाते हैं, जो भारतीय खाने से बिलकुल अलग होता है। ठीक उसी तरह जरूरी नहीं कि जिस तरह के शो वहां बनते हैं, वो यहां भी बनें।
सवाल-बच्चों और युथ के लिहाज से टीवी कितनी सुरक्षित है?
जवाब- टीवी सबके लिए एक जैसी ही है। हां, किसी का स्ट्रगल ज्यादा होता है, तो किसी का कम। लेकिन यहां आसानी से कुछ नहीं होता। आपको मेहनत करना पड़ता है। यहां लक से ज्यादा मेहनत मायने रखती है। आप काम को लेकर कितने पैशनेट हैं, ये मायने रखता है। आज कल के युवाओँ को चाहिए कि चीजें जल्दी-जल्दी हो। उनमें वो धैर्य नहीं है, जो कि इस फील्ड में चाहिए होता है। यहां जितना मायने आपकी मेहनत रखती है, उतना ही मायने ये बात भी रखती है कि आप में धैर्य कितना है।
सवाल-मात्रछाया संस्था से कैसे होगी मदद?
जवाब- जैसा कि नाम है मात्रछाया, इसका मतलब है ममता की छाया। इस संस्थान ने उन बच्चों और की मदद करने की कोशिश की है, जिनके सर से पिता का साया उठ गया है। इनकी माताओं को रोजगार दिए जाने की योजना है और साथ ही इन बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी भी मात्रछाया ने ली है। कुल मिला कर कहा जाए, तो इस संस्थान के जरिये ऐसे बच्चों की मदद कर हम उनका बोझ कम करना चाहते हैं।
सवाल- लखनऊ के बारे में क्या सबसे ज्यादा पसंद है?
जवाब- यहां की तहजीब और फूड सबसे ज्यादा पसंद है। टुंडे कबाबी का जो स्वाद है, वो लाजवाब है।
Updated on:
13 Feb 2018 12:12 pm
Published on:
12 Feb 2018 07:19 pm
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