
अटल बिहारी वाजपेयी नहीं रहे, यूपी के राजनीति में छाई शोक की लहर
लखनऊ. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तबीयत बुधवार को अचानक खराब हो गई जिसके चलते उनका आज गुरुवार को निधन हो गया। उनके निधन से देश ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक हस्ती व मार्गदर्शक खो दिया, जिसके लिए मूल्य व सिद्धांत हमेशा सर्वोपरि रहे। अटल बिहारी वाजपेयी के न रहने की खबर लगते ही उत्तर प्रदेश की राजनीति गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई है। लखनऊ भाजपा ऑफिस से सारी सजावट हटा दी गई है अौर सारे कार्यक्रम भी रद्द कर दिए गए है।
बता दें कि एम्स मेडिकल बुलेटिन जारी कर बताया गया था कि पिछले 24 घंटों में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की हालत काफी बिगड़ी चुकी थी। वह लाइफ सपॉर्ट सिस्टम पर थें। बीते एक महीने से अटल बिहारी वाजपेयी यूटीआई इंफेक्शन, लोवर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट इंफेक्शन और किडनी संबंधी बीमारियों के कारण एम्स दिल्ली में भर्ती थें।
जानिए उनका राजनीति सफर
भाजपा के संस्थापकों में शामिल अटल तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे थें। अटल बिहारी वाजपेयी नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए। वे दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक सांसद रहे। बीच में कुछ लोकसभाओं से उनकी अनुपस्थिति रही। ख़ासतौर से वर्ष 1984 में जब वो ग्वालियर में कांग्रेस के माधवराव सिंधिया के हाथों पराजित हुए थे।
वे वर्ष 1962 से 1967 और 1986 में राज्यसभा के सदस्य भी रहे। 16 मई 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री बने। लेकिन लोकसभा में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से 31 मई 1996 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा. इसके बाद वर्ष 1998 तक लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे। वर्ष 1998 के आमचुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ उन्होंने लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत साबित किया और इस तरह एक बार फिर प्रधानमंत्री बने।
लेकिन एआईएडीएमके द्वारा गठबंधन से समर्थन वापस लेने के बाद उनकी सरकार गिर गई और एक बार फिर आम चुनाव हुए। वर्ष 1999 में हुए चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझा घोषणापत्र पर लड़े गए और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया था ।तब गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली थी।
Updated on:
16 Aug 2018 05:40 pm
Published on:
16 Aug 2018 05:35 pm
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