
अयोध्या में मुस्लिम कर रहे यह काम, मंदिर-मस्जिद विवाद पर फैसला आने से पहले जरूर पढ़ें यह खबर
अयोध्या. अयोध्या के दशरथ महल, बड़ा स्थान के ठीक सामने जब लोग गुजरते हैं तो आवाज गूंजती है कि महाराज जी कंठी माला ले लो। तभी भीड़ में चल रहे कुछ संत रुककर रुद्राक्ष की कंठी देखते हैं और पूछते हैं कि बेटा तुम्हारा क्या नाम है। लड़का जवाब देता है मेरा नाम आतिफ खान है। फिर संत उस बच्चे से कंठी लेकर उसकी पीठ थपथपाते हैं। कंठी बेचने वाले आतिफ ने बताया कि यह दुकान बड़ा स्थान के महंत की है। वह उसको बहुत मानते हैं। रामनगरी की यह तस्वीर सुरक्षा के लिहाज से सबसे संवेदनशील श्रीरामजन्मभूमि मार्ग के बड़ा स्थान की है। थोड़ा आगे बढ़ने पर बगल की दुकान से एक मासूम बेटी की आवाज आई कि दुर्गा मां की फोटो ले लो। मूर्ति, माला, लॉकेट, गदा ले लो। यह आवाज सुनकर रामलला के दर्शन करने जा रहे तमाम भक्त रुके उस बेटी का नाम पूछा, उसने अपना नाम अतिया बताया। मैं स्कूल जाती हूं, लेकिन आज छुट्टी थी। इसलिये परिवार की मदद कर रही हूं। यह दुकान भी बड़ा स्थान के महंत की ही थी।
हमें कभी नहीं हुआ कोई नुकसान
श्रीरामजन्मभूमि मार्ग की आखिरी बाजार रामगुलेला है। यहां बैरिकेडिंग के पास आसित खान नाम के शख्स के हाथ में राम, हनुमान, शंकर समेत तमाम देवी-देवताओं के फोटो लॉकेट, गदा दिखे। यहां से चूड़ी, कंगन प्रसाद के रूप में महिलाएं खरीदती दिखाई दीं। आसपास में सीडी की दुकानें हैं। आसित के मुताबिक बाबा के इंतकाल के बाद वह दुकान संभालते हैं, उन्हें कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। लेकिन जब बाहरी लोग बवाल के इरादे से आते हैं तो सुरक्षा के लिये महाराज कुछ देर दुकान जरूर बंद करने को कह देते हैं। लेकिन 1992 में कारसेवा के दौरान उपद्रव में उसका कुछ नुकसान नहीं हुआ, संतो ने हमारी रक्षा की। आसित ने बताया कि यह दुकान भी संत की ही है। उन्होंने कभी खाली करने के लिये नहीं कहा, बल्कि वह समय-समय पर हमारी काफी मदद करते हैं।
रामलला के कपड़े सिलते थे बाबू भाई
हनुमानगढ़ी-नयाघाट मुख्य मार्ग पर अयोध्या मुस्लिम वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष शादिक अली उर्फ बाबू खां की कपड़ा सिलने की दुकान है। उनके मुताबिक बचपन में रामलला के कपड़े उनके यहां सिले जाते थे। जिस रामलला को लेकर इतना विवाद है उनके कपड़े समेत कई मंदिरों में विग्रह के कपड़े वह खुद सालों तक सिलते थे। अब तीन साल से दूसरा टेलर सिलता है। यहां कभी हिंदू-मुस्लिम के बीच विवाद नहीं हुआ। वह हमारी ईद में सेंवई खाने आते हैं तो हम सपरिवार उऩके यहां होली-दीपावली, दशहरा मनाते हैं। अकेले हनुमानगढ़ी के महंतों ने पचास से अधिक मुसलमानों को अपनी दुकानें रोजी-रोटी के लिये दी हैं। पूरी अयोध्या में ऐसे सैंकड़ों मुसलमान हैं जो संत-महंतों की बनाई दुकान में रोजगार करते हैं। अजीज सब्जी बेचते हैं तो रफीक कंठी माला, हसन कपड़े सिलते हैं। तो टिल्लू, रहमत आदि चूड़ी बेचते हैं। विद्याकुंड के महंत ने भी मुसलमानों को दुकानें दी हैं। मुसलमान यहां श्रद्धलुओं से लेकर सभी के रोजमर्रा की जरूरत के सामान बेंचकर रोजीरोटी कमाने हैं। कभी किसी ने भेद नहीं किया।
बाहरी लोग माहौल करते हैं खराब
विद्याकुंड के महंत उमेश दास के मुताबिक मुसलमान भाइयों के यहां कभी द्वेष नहीं रहता। बाहरी लोग माहौल खराब करते हैं। मठ की ओर से सुबराती चाचा को पहली दुकान दी गई थी। अब उनके इंतकाल के बाद बेेटे दुकान देखते हैं। कुल तीन दुकानें मुसलमानों को रोजगार के लिये वर्षों से दी गई है। हमेशा उनसे अच्छे संबंध रहते हैं और जरूरत पर मदद की जाती है। वहीं दशरथमहल बड़ा स्थान के महंत बिंदुगद्दाचार्य देवेंद्र प्रसादाचार्य के मुताबिक अयोध्या मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की धरती है। यहां सदा सद्भाव रहा है। बैर भाव कभी नहीं रहा। मठ की ओर से मुसलमान भाइयों को दुकानों में कारोबार के अवसर और जरूरत पड़ने पर उन्हें मदद भी दी जाती है।
Published on:
23 Oct 2019 02:30 pm
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