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भाजपा को नहीं भा रहे राम!

मंदिर मुद्दे पर भगवा खेमे ने साधा मौन। इस चुनावी मौसम में भी क्यों आखिर नहीं बह रही राम नाम की बयार

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Madhukar Mishra

Dec 30, 2016

narendra giri

narendra giri

- मधुकर मिश्र
लखनऊ। 'जय रघुनंद जय सियाराम जानकी वल्लभ जय सियाराम।' विश्व हिंदू परिषद के तमाम नेताओं के फोन की काॅलर ट्यून रामलला के गुणगान करने वाले इसी सुमधुर भजन के साथ सुनाई देती है, लेकिन इन दिनों ये नेता न जाने कहां गायब हो गए हैं। न तो कोई राम की चर्चा कर रहा है और न ही उनके मंदिर बनवाने को लेकर आंदोलन हो रहा है। विहिप ही नहीं आरएसएस से जुड़ी दूसरी शाखाओं से भी कोई इस पर चर्चा करता नजर नहीं आ रहा है। अयोध्या में आए दिन राम से जुड़े कार्यक्रम हो रहे हैं। आमजन के साथ साधु-ंसंत शामिल हो रहे हैं। शहर में संघ और विहिप की बैठकें भी आए दिन होती ही रहती हैं, लेकिन राम नाम पर सभी ने मौन साध रखा है।

vhp person
...जाने कहां गुम गए
कभी भाजपा नेताओं, कार्यकर्ताओं के कंधे से रामनामी अंगौछा, प्रस्तावित मंदिर की फोटो वाला झोला और हाथों में मंदिर की आकृति वाला चाभी गुच्छा हुआ करता था, लेकिन अब वह ढूढ़ने से भी नहीं दिखाई देता। इसे राजनीति का तक़ाज़ा कहें या समय का बदलाव, राम मंदिर मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष सभी ने मौन साध रखा है। इस मुद्दे पर कभी सक्रिय रहने वाले तमाम बड़े नेता और संत के चले जाने के बाद सन्नाटा सा पसरा हुआ है। न तो आज रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत रामचंद्रदास हैं और न ही विहिप सुप्रीमो अशोक सिंहल जो सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष के नेताओं पर दबाव डालकर इस मुद्दे के समाधान की अगुवाई करते नजर आया करते थे। इन दोनों बड़ी हस्तियों के साथ हाशिम अंसारी भी रामलला को आजाद देखने का सपना संजोए चले गए। कुल मिलाकर मंदिर आंदोलन नेतृत्व विहीन और तमाम धड़ों में बंटा हुआ नजर आता है।

ram temple

नेता ठाठ में तो रामलाल टाट में क्यों?
जिन्होंने नब्बे के दशक में भाजपा की चुनावी रैलियों और जनसभाओं को देखा है, उनके लिए राम के नाम पर भगवा खेमे का यह मौन किसी आश्चर्य से कम नहीं है, क्योंकि उन दिनों हर छोटे-बड़े नेता का भाषण जय श्री राम से शुरू होकर जय श्री राम पर ही खत्म हुआ करता था। जनसभाओं में बच्चा-बच्चा राम का जन्मभूमिक के काम का और सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे जैसे नारे गूंजते थे। आलम यह है कि राम मंदिर आंदोलन से जुड़ा न तो वह बच्चा नजर आता है न तो वो बुजुर्ग। स्थितियां बदल गई हैं। सत्ता का सपना साकार हो चुका है। नतीजतन नेता ठाठ में और रामलला वहीं के वहीं टाट में हैं।

vinod bansal

विहिप ने किया भाजपा से सवाल?
विश्व हिंदू परिषद की माने तो राम मंदिर न कभी चुनावी मुद्दा था न है और न ही वे इसे कभी मानते रहे हैं। ऐसे में उनकी गुजारिश है कि इसे राजनीति में न घसीटा जाए। विहिप प्रवक्ता विनोद बंसल के अनुसार ''यदि कोई राम मंदिर मुद्दे पर अपना मत रखता है तो वह मत सीधे-सीधे मतदाताओं को जरूर प्रभावित करता है। ऐसे में रामजन्मभूमि के प्रति जो लोग प्रतिबद्धता व्यक्त करेंगे तो निश्चित रूप से उन्हें विजय श्री मिलेगी। जो लोग भगवान राम से द्रोह करेंगे उन्हें इसकी सजा मिलेगी।'' जैसा कि बीते समय में देखने को भी मिला है। इसलिए भाजपा को स्पष्ट करना चाहिए कि वह रामजी के साथ हैं या रामद्रोहियों के साथ हैं।

राम मंदिर निर्माण के मामले पर विनोद बंसल कहते हैं कि ''विहिप 1989 की धर्म संसद में किए गए अपने उस ऐलान पर कायम है जिसमें मंदिर वहीं, मस्जिद नहीं और बाबरी के नाम पर तो कहीं नहीं की बात कही गई थी। इसलिए जिस प्रारूप के अनुसार राम मंदिर तैयार करने की बात कही गई थी, वह उसी के अनुसार तैयार होगा।'' हालांकि कब तैयार होगा इसका उनके पास भी अभी जवाब नहीं है।

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विकास नहीं हिंदुत्व ने जिताया मोदी को
राम मंदिर मुद्दे पर साधु समाज कई खेमों में बंटा नजर आता है। कुछ भगवा खेमे साथ खड़े तो कुछ उसके विरोध में तो कुछ इस मुद्दे पर तटस्थ नजर आते हैं। हालांकि सभी इस बात को मानते हैं कि चुनाव में राम मंदिर मुद्दा तमाम दलों को प्रभावित करता है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि कहते हैं कि ''अगर मोदी समझते हैं कि यूपी में उन्हें लोकसभा की 73 सीट विकास के नाम पर मिली है तो ये उनकी बहुत बड़ी गलतफहमी है। लोगों ने उन्हें हिंदुत्व के नाम पर वोट दिया था क्योंकि उन्होंने क्या विकास किया और क्या कर रहे हैं सभी लोग जानते हैं।'' नरेंद्र गिरि के अनुसार आरएसएस विहिप जैसे संगठन सनातन धर्म के विरोधी हैं। वह सभी मठ-मंदिरों साधु-संतों को अपने अधीन कर लेना चाहते हैं। जहां-जहां इनकी सरकार है, वहां पर इन लोगों ने कब्जा भी कर लिया है। केवल उत्तर प्रदेश बचा हुआ है, इसलिए वह सुबह उठते ही यही मनाते हैं कि वे यहां आने न पाए।

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स्वामी ला पाएंगे अयोध्या के अच्छे दिन?
राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर भाजपा के आला नेताओं ने भले ही चुप्पी साध रखी हो लेकिन अपने बयानों के जरिए सुर्खियों में बने रहने वाले सुब्रह्मण्यम स्वामी इस मुद्दे को आए दिन हवा देते रहते हैं। यह बात अलग है कि उनकी बात को न तो भाजपा के नेता और न ही विरोधी खेमा खास तवज्जो देता है। स्वामी के मुताबिक यदि राजीव गाधी अगर दोबारा प्रधानमंत्री चुने जाते तो अब तक राम मंदिर निर्माण हो गया होता। हालांकि उनका कहना है कि यदि भाजपा इस मुद्दे को आगे नहीं बढ़ाती तो वह अकेले ही राम मंदिर बनवाने की प्रक्रिया में जुट जाएंगे। दावा यह भी है कि अगले साल राम मंदिर निर्माण शुरू हो जाएगा।

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राम नहीं मोदी मंतर से जीतेंगे चुनावी जंग
राम मंदिर निर्माण को लेकर सक्रिय सुब्रह्मण्यम स्वामी अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण देते हुए इस बात को साफ कर चुके हैं कि जब कभी भी भाजपा ने राम के मुद्दे से किनारा किया है, वह चुनाव हार गई है। गौरतलब है कि इंडिया शाइनिंग की तरह यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा विकास के मुद्दे के दम भरती नजर आ रही है। लोकसभा चुनाव के दौरान भी भाजपा ने अंतिम समय में अपने घोषणा पत्र में राम मंदिर को शामिल किया था। उस वक्त मुरली मनोहर जोशी ने सफाई पेश करते हुए कहा था कि पार्टी ने राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को सांस्कृतिक खंड में रखा है। घोषणा पत्र में संविधान के दायरे में मंदिर निर्माण की संभावनाएं तलाशने की बात कही गई थी। आज भी भाजपाई सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमे की दुहाई देते हुए मुद्दे से कन्नी काट लेते हैं। चुनावी चेहरे के संकट से जूझ रही भाजपा को माया और अखिलेश के मुकाबले राम से ज्यादा मोदी का चेहरा मुफीद लग रहा है। जबकि कार्यकर्ता और नेता अयोध्या स्थित राम मंदिर की बजाय लखनऊ स्थित उस पार्टी मुख्यालय की परिक्रमा में ज्यादा यकीन कर रहे हैं, जहां अब आए दिन पार्टी के देश एवं प्रदेश के अध्यक्ष बैठने लगे हैं।

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