कभी भाजपा नेताओं, कार्यकर्ताओं के कंधे से रामनामी अंगौछा, प्रस्तावित मंदिर की फोटो वाला झोला और हाथों में मंदिर की आकृति वाला चाभी गुच्छा हुआ करता था, लेकिन अब वह ढूढ़ने से भी नहीं दिखाई देता। इसे राजनीति का तक़ाज़ा कहें या समय का बदलाव, राम मंदिर मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष सभी ने मौन साध रखा है। इस मुद्दे पर कभी सक्रिय रहने वाले तमाम बड़े नेता और संत के चले जाने के बाद सन्नाटा सा पसरा हुआ है। न तो आज रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत रामचंद्रदास हैं और न ही विहिप सुप्रीमो अशोक सिंहल जो सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष के नेताओं पर दबाव डालकर इस मुद्दे के समाधान की अगुवाई करते नजर आया करते थे। इन दोनों बड़ी हस्तियों के साथ हाशिम अंसारी भी रामलला को आजाद देखने का सपना संजोए चले गए। कुल मिलाकर मंदिर आंदोलन नेतृत्व विहीन और तमाम धड़ों में बंटा हुआ नजर आता है।