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जाति जनगणना का पूरा इतिहास: 2011 में गिनती कराके भी जातियों की संख्या बताने से क्यों मुकरी थी कांग्रेस सरकार?

Caste Census: सपा जाति जनगणना के मुद्दे पर जिस तरह आक्रामक है। उससे ये सवाल उठता है कि आखिर ये मुद्दा इतना अहम क्यों है? और कांग्रेस ने क्यों जातियों के आंकड़े बताने से इनकार किया था?

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लखनऊ

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Rizwan Pundeer

Feb 24, 2023

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तस्वीर प्रतीक के तौर पर ली गई है

अखिलेश यादव ने विधानसभा में जोरदार तरीके से जाति जनगणना का मुद्दा उठाया है। दिलचस्प बात ये रही कि अखिलेश ने सदन में बीजेपी के सहयोगी संजय निषाद और अपना दल के आशीष पटेल से इस पर सवाल किया तो दोनों ही नेता अखिलेश के पक्ष में दिखे।


कुछ दिन पहले डिप्टी केशव मौर्य भी जातिगत जणगणना के पक्ष में दिखे थे। जातिगत जनगणना का मुद्दा आखिर क्यों इतना बड़ा है? कोई दल इससे इनकार नहीं करता है और सरकार में रहते हुए इसे कराता भी नहीं है। देश में जातिगत जनगणना का इतिहास क्या है और सरकार में रहने वाली पार्टियां इससे बचती क्यों दिखती हैं? इन सवालों के जवाब आज हम बता रहे हैं।

जनगणना की शुरुआत अंग्रेजों ने की, जातियां भी गिनीं
भारत में हर 10 साल में एक बार जनगणना की जाती है, यानी लोगों को गिना जाता है। जिससे पता चलता है कि देश की आबादी कितनी है। इस प्रक्रिया के तहत सरकारी कर्मचारी घर-घर जाते हैं और देश के लोगों की उम्र, जेंडर, भाषा, धर्म, ग्रामीण और शहरी आबादी के बारे में एक रजिस्टर में दर्ज करते हैं। जिसे इकट्ठा कर पूरे देश की जनसंख्या बताई जाती है।

देश में लोगों को गिनने की व्यवस्था का इतिहास करीब 150 साल पुराना है। अंग्रेजों ने दिल्ली में काबिज होने के बाद साल 1872 में पहली बार जनगणना कराई थी। इसमें जातियां भी गिनी गईं तो इसे हम पहली जातीय जनगणना भी कह सकते हैं। 1872 के बाद जिसके बाद से हर 10 साल में ये होता आ रहा है। अंग्रेजों के बाद आजाद भारत की सरकारें भी हर दस साल में जनगणना कराती रही हैं।

आजादी और बंटवारे से पहले हुई थी आखिरी जातिगत जनगणना
अंग्रेजों के समय हुई जनगणना में लोगों से उनकी जाति भी पूछा जाती थी। ये सिलसिला 1872 से साल 1931 तक चला। साल 1941 की जनगणना में जाति के आंकड़े जुटाए गए लेकिन सार्वजनिक नहीं किए गए। इसके बाद 1947 में देश आजाद हो गया।


देश में जातियों की संख्या को लेकर जो डाटा है, उसका आधार 1931 की जनगणना ही है। आजाद भारत में कभी भी जातियों को नहीं गिना गया है। आजादी के बाद 1951 से 2011 तक जो जनगणना हुई हैं, उनमें सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति यानी SC-ST को ही गिना गया है।

मंडल कमीशन के बाद तेज हुई जातियों की गिनती की मांग
भारत सरकार ने साल 1979 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए मंडल कमीशन का गठन किया। मंडल कमीशन की ओबीसी को 27% आरक्षण की सिफारिशों को 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने लागू कर दिया था। इस फैसले ने देश की राजनीति पर गहरा असर किया और जाति जनगणना की मांग को और ज्यादा तेज कर दिया।

2011 में कांग्रेस ने जाति जनगणना कराई, पब्लिश करने से कर दिया इनकार
जाति गणना की लंबे समय से चली आ रही मांग को 2011 में उस समय की कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने मान लिया। सरकार ने सामाजिक आर्थिक जातिगत जनगणना कराई। जनगणना के बाद सरकार ने जाति से जुड़े आंकड़े सार्वजानिक करने से इनकार कर दिया। इसके पीछे कई तरह के टेक्नीकल इश्यू बताए और कहा गया कि बाद में इन आंकड़ों को जारी किया जाएगा।

2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार आ गई और 2019 में फिर से भाजपा की वापसी हो गई। 2011 के जातिगत आंकड़ों की फाइल दबी की दबी ही रही। भाजपा सरकार की ओर से भी इस पर पूर्व की सरकार जैसी ही बातें कही गईं।

साल 2015 में कर्नाटक में भी जातिगत जनगणना करवाई जा चुकी है। इससे हासिल आंकड़े भी सार्वजानिक नहीं किए गए। कुछ समय पहले बिहार सरकार ने भी जाति जनगणना का ऐलान किया है।


जाति के मुद्दे को क्यों उठा रहे राजनीतिक दल

देश की जनसंख्या में अनुसूचित जाति 15% और अनुसूचित जनजाति 7.5% है। इसी आधार पर इस वर्ग को आरक्षण मिलता है। मंडल कमीशन के आंकड़ों के आधार पर देश में ओबीसी आबादी 52% है। इसके लिए मंडल कमीशन ने साल 1931 की जनगणना को आधार माना है।

देश में पिछड़ी जातियों की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों का कहना है कि 1931 के बाद देश का बंटवारा हो चुका है। कई जातियों का स्टेटस भी बदल चुका है। ऐसे में 1931 की जनगणना कोई आधार नहीं हो सकती है। ओबीसी की तादाद 52% से काफी ज्यादा है। ओबीसी को मिला 27% आरक्षण उनके साथ नाइंसाफी है। ऐसे में जातियों की गिनती हो, ताकि सबको हिस्सेदारी मिल सके। यानी देखें तो जातिगत जनगणना की मांग पिछड़ों की राजनीति को धार देने की कोशिश भी है।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव का विधानसभा का बयान भी कुछ इसी तरह का है। वो कहते हैं, "भाजपा की सरकार सबके साथ, सबके विकास का नारा देती है। जब ये पता ही नहीं है कि किसकी संख्या कितनी है तो कैसे सबका साथ लिया जाएगा और सबका विकास होगा। ऐसे में सरकार सभी जातियों को गिने और जिसकी जितनी संख्या है, उतनी हिस्सेदारी उस जाति की सभी क्षेत्रों में सुनिश्चित करे।"

इस बार भी नहीं होगी जातिगत जनगणना?
भारतीय जनता पार्टी जब विपक्ष में थी तो जाति जनगणना के पक्ष में दिखती थी। 2011 की जनगणना से ठीक पहले भाजपा ने इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया था। हालांकि सरकार में आने के बाद उसका रुख अलग है।

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने जुलाई 2021 को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया कि केंद्र सरकार ने एससी और एसटी के अलावा किसी और जाति की गिनती का कोई आदेश नहीं दिया है।

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2021 की जनगणना कोरोना की वजह से टल गई थी, इसके आने वाले समय में होने की उम्मीद है। हालांकि अभी तक सरकार की ओर जनगणना की तारीख का ऐलान नहीं हुआ है।