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सीएम योगी के बिजली निजीकरण के फैसले का भाजपा ही कर रही विरोध, कहा- फैसले वापस लें

यूपी के पांच शहरों लखनऊ, वारणसी, गोरखपुर, मेरठ और मोरादाबाद में बिजली कंपनी को प्राइवेट कंपनी के हाथों देने का फैसला किया है.

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लखनऊ

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Abhishek Gupta

Mar 31, 2018

Yogi Decision

Yogi Decision

लखनऊ. राजधानी में सीएम योगी द्वारा बिजली कंपनी के नीजिकरण के ऐलान के बाद विद्युत विभाग के कर्मचारियों का विरोध लगातार जारी रहा है। यूपी के पांच शहरों लखनऊ, वारणसी, गोरखपुर, मेरठ और मोरादाबाद में बिजली कंपनी को प्राइवेट कंपनी के हाथों देने का फैसला किया है। विरोध में विद्युत कर्मचारी काम छोड़ सड़क पर उतर आए साथ ही ये ऐलान किया कि अब अगर सरकार ने यह फैसला वापस नहीं लिया तो 9 अप्रैल से 72 घंटे के लिए काम का बहिष्कार कर वे अपना विरोध जताएंगे।

कर्मचारियों का कहना है कि सरकार ने बिजली कंपनी का निजीकरण करने का फैसला इसलिए लिया है क्योंकि खुद सरकार की वजह से बिजली विभाग घाटे में है। यूपी सरकार के तमाम दफ्तरों, मंत्रियों, विधायकों का मिलाकर करीब 1000 करोड़ रुपए का बिजली बिल बकाया है।

भाजपा सांसद व विधायकों ने सरकार से की फैसला वापस लेने की अपील-

इधर खुद भाजपा सांसद व विधायकों ने भी इसको लेकर अपना विरोध जताया है और फैसले को वापस लेने की अपील की है। लखनऊ में भाजपा सांसद कौशल किशोर ने सीएम योगी को पत्र लिखते हुए कहा है कि प्राइवेट कंपनी का मकसद सिर्फ और सिर्फ मुनाफा कमाना है और वो कभी भी सार्वजनिक क्षेत्र का विकल्प नहीं हो पाएगी। लिहाजा सरकार को अपने इस फैसले के बारे में सोचना चाहिए। इसी तरह वाराणसी के विधायक रविंद्र जयसवाल, मलिहाबाद से विधायक जय देवी, रफीक अंसारी, वाराणसी कैन्ट के भाजपा विधायक रवीन्द्र जायसवाल, मलिहाबाद की भाजपा विधायक जय देवी, वाराणसी के विधायक और अपना दल विधान मंडल दल के नेता नील रतन सिंह पटेल 'नीलू' समेत कई नेताओं ने सीएम योगी को खत लिखकर उनसे अपना फैसला वापस लेने की अपील की है।

सपा-बसपा सरकार में भी लिए गए ऐसे फैसले-

मायावती सरकार के कार्यकाल के दौरान साल 2010 में आगरा की बिजली वितरण फ्रेंचाइजी को टॉरेंट के हाथों में सौंप दिया गया था। योगी सरकार ने हाल ही में प्राइवेट फ्रैंचाइजी को बिजली वितरण करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। इसी तरह के प्रस्ताव को अखिलेश सरकार में भी पास किया गया था। हालांकि सरकारी कर्मचारी, जिनको नौकरी खो देने का डर था, के विरोध के बाद सपा सरकार ने अपना फैसला वापस ले लिया था।