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इनके लिए अब क्या मुर्दे ही बन गए कमाई का जरिया?

कर्मचारियों में पैसे कमाने की ऐसी होड़ है कि उनके लिए क्या ज़िंदा क्या मुर्दा।

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Dikshant Sharma

Apr 12, 2016

bhaisakund

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लखनऊ। नगर निगम की कार्यशैली किसी से छुपी नहीं है। एक और ऐसा वाक्या सामने आया जिससे सुनकर आप भी हैरान रह जाएंगे। कर्मचारियों में पैसे कमाने की ऐसी होड़ है कि उनके लिए क्या ज़िंदा क्या मुर्दा।

भैंसाकुण्ड में शवों के निस्तारण के लिए इलेक्ट्रॉनिक (विद्युत) शव देह संस्कार केंद्र बना हुआ है। प्रतिदिन यहाँ सम्बंधित थानो के सिपाही लावारिस शवो का देह संस्कार मात्र 500-600 में कर देते थे। यह बात शायद कर्मचारियों को रास नहीं आई।

खाकी के नुमाइंदे बताते हैं कि जब शवों के दहन के लिए वहां पहुंचो को विद्युत शव देह ख़राब होने की बात कही जाती है। मजबूरन शवो के अंतिम संस्कार करने के लिए गरिब परिजन और पुलिस कर्मी खुद लकड़ी के लिए लंबी लाइन लगा रहे हैं।

कैसे बढ़ी धन उगाही

पहले विद्दुत शव गृह में अंतिम संस्कार का खर्च इस प्रकार था - 100 विद्दुत चार्ज, 500 पंडे का खर्च, 650 रुपये वाहन खर्च और 400 लेबर खर्च।

अब 220 रुपये में 7 मन (1 मन =20 केजी) लकड़ी, एक शव में 300 kg राल, 650 रुपये वाहन 800 रुपये लेबर चार्ज।

पुलिस कर्मी भी नहीं है अछूते
जब पुलिस कर्मियो का यह हाल है तो गरीबों की समस्याओं का अंदाज़ा आप बखूबी लगा सकते हैं। सूत्र ने बताया कि शवों को जब वहाँ लेकर पहुंचे तो विद्युत संस्कार केंद्र के न चलने की बात कही गयी। जब शवों को गाड़ने की बात कही गयी तो उसके लिए भी ज़िम्मेदारों ने मना कर दिया। ऊपर से लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के लिए सरकारी कोटे में फण्ड नहीं है।

जिम्मेदारों का ढीला रवैया-
जब नगर निगम के ज़िम्मेदार अवर अभिनेता, मार्ग प्रकाश विभाग सूर्य विक्रम सिंह से बात की गयी तो उन्होंने यह मना की विद्युत संस्कार केंद्र ख़राब है। उन्होंने कहा कि मशीन के पुराने होने के चलते इसमें मर्मत का कार्य चल रहा है। अभी 10 से 15 दिन का समय इसमें और लगेगा।

ज़ाहिर है कि शहर में सबसे अधिक शवों का अंतिम संस्कार भैंसाकुंड में ही होता है। कितने गरीब परिवार के लोग भी यहाँ आते है। इस विद्युत संस्कार केंद्र के निर्माण के पीछे भी जेब पर कम भोज और पेड़ों के संरक्षण का हवाला दिया गया था। पर निगम अधिकारियों का ढीला रवैया कुछ और ही बयां कर रहा है।