
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कालजयी कविताएं
लखनऊ.अटल बिहारी वाजपेयी एक ऐसी शख्सियत हैं, जिनमें कई गुणों का समावेश है। वे एक कुशल राजनीतिक के साथ-साथ साहित्यकार और एक कवि भी थे। आज अटल जी दिल्ली के एम्स में एडमिट हैं। देश आज उनकी सलामती के लिए दुआएं कर रहा है। अटल जी पहली बार उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से 1957 में लोकसभा का चुनाव लड़कर संसद पहुंचे थे।
अटल जी का बोलने का अंदाज उनको और खास बना देता है। संसद में उनका भाषण हो या किसी रैली को संबोधित करना। अटल जी देश के एक ऐसे नेता हैं जिन्हें पार्टी से काफी ऊपर माना जाता है। वे सबके प्रिय रहे हैं, उन्हें हर पार्टी के नेता सम्मान देते हैं। अटल जी एक कवि भी थे, उनकी कविताएं भी लोगों को खूब पसंद आती हैं।
अटल जी एक माने हुए कवि भी हैं। उन्होंने कई कविताएं लिखी हैं। अटल जी ने समय-समय पर अपनी कई कविताओं को संसद और दूसरे मंचों से पढ़ा भी है। अटलजी का कविता संग्रह मेरी इक्कावन कविताएं काफी लोकप्रिय हैं, उनके समर्थकों में इसका काफी क्रेज है। यहां पर उनकी कुछ चुनिंदा कविताओं के बारे में बताया जा रहा है।
गीत नया गाता हूं
टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात कोयल की कुहुक रात
प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूं
गीत नया गाता हूं
टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा,
काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं
गीत नया गाता हूं
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कदम मिलाकर चलना होगा
बाधाएं आती हैं आएं
घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
निज हाथों में हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा.
कदम मिलाकर चलना होगा.
हास्य-रूदन में, तूफानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा.
कदम मिलाकर चलना होगा.
उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा.
कदम मिलाकर चलना होगा.
सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढलना होगा.
कदम मिलाकर चलना होगा.
कुछ कांटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा.
क़दम मिलाकर चलना होगा.
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एक बरस बीत गया
झुलासाता जेठ मास
शरद चांदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया
सीकचों मे सिमटा जग
किंतु विकल प्राण विहग
धरती से अम्बर तक
गूंज मुक्ति गीत गया
एक बरस बीत गया
पथ निहारते नयन
गिनते दिन पल छिन
लौट कभी आएगा
मन का जो मीत गया
एक बरस बीत गया
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दूध में दरार पड़ गई
खून क्यों सफेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया.
बंट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.
खेतों में बारूदी गंध,
टूट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है.
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई.
अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता.
बात बनाएं, बिगड़ गई.
दूध में दरार पड़ गई.
अटलजी की ये कुछ कविताएं हैं जो लोगों में काफी लोकप्रिय हैं। जब अटल जी अपनी कविताएं सुनाते थे तो हर कोई मानों उसमें खो सा जाता था। वे राजनेता, साहित्यकार के साथ एक कवि भी थे। आज उनकी सलामती के लिए पूरा देश दुआ कर रहा है।
Published on:
16 Aug 2018 04:07 pm

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