
लखनऊ. फिरोजाबाद शहर चूड़ियों के लिए भारत के साथ-साथ पूरे विश्व में मसहूर है। फिरोजाबाद विश्व में खनकती चूड़ियों का शहर के नाम से जाना जाता है। फिरोजाबाद शहर सिर्फ चूड़ियों के लिए ही नहीं बल्कि अन्य सामान जैसे घर में सजाएं जाने वाली कांच की वस्तुएं और लाइट्स के लिए भी जाना जाता है।
प्राचीन काल के आक्रमणकारी जब भारत में कई कांच की वस्तुएं लाए थे। जब इन कांच के सामानों को अस्वीकार कर दिया, तो उसे स्थानीय तौर -तरीके से बनी भट्ठियों में पिघला दिया गया। इन चूल्हों को स्थानीय भाषा में भैंसा भट्टी कहा जाता है। इस तरह की पुरानी और पारंपरिक भट्टियां अभी भी अलीगढ़ के पास ससानि और पुरदल नगर में इतिहास को समेटे हुए मौजूद है। और इसका इस्तेमाल मूलरूप से छोटी बोतलें और चूड़ियां बनाने के लिए ही किया जा रहा है।
हाजी रुस्तम उस्ताद ने की उद्योग की शुरूआत
फिरोजाबाद में हाजी रुस्तम उस्ताद द्वारा उद्योग की शुरूआत की गई थी। हाजी रुस्तम उस्ताद की दरगाह यमुना नदी के किनारे स्थित सोफीपुर गांव में है। फिरोजाबाद में कांच उद्योग के पिता हाजी रुस्तम उस्ताद को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रति वर्ष भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। इस शहर की बनी चूड़ियों की खास बात यह कि इन चूड़ियों में किसी तरह का कोई जोड़ नहीं होता है और इसे स्थानीय भाषा में कड़ेछल की चूड़ी कहते हैं। समय के साथ, उत्पादन धीरे-धीरे स्थानीय लोगों के बीच व्यापक हो गया। इस तरह फिरोजाबाद अपनी चूड़ियों की खनक के लिए जाना जाने लगा। 1989 के बाद से फइरोजाबाद में झूमरों व अन्य कांच की वस्तुओं में कलात्मक तरीके से कांच का इस्तेमाल किया जाने लगा।
फिरोजाबाद बना कांच की वस्तुओं के निर्माण का हब
अब यहां लगभग 400 ग्लास उद्योग पंजीकृत हैं। जिनमें विभिन्न प्रकार के कांच की वस्तओं का उत्पादन होता है। अब शीशे के उत्पादन में कोयले की जगह प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल होने लगा है। बदलते समय के अनुसार फिरोजाबाद कांच निर्माण के नए युग में प्रवेश कर चुका है। यह अलग-अलग तरह की कांच की वस्तुओं के निर्माण का एक प्रमुख हब बन गया है और अपनी वैश्विक उपस्थिति विश्व भर में दर्ज करा रहा है। आज जार, मोमबत्ती स्टैंड, चश्मे, फूलों के गुलदस्ते और सजावटी रोशनी, बल्ब सहित सभी प्रकार के कांच के सामान इस शहर में तैयार किए जा रहे हैं।
Updated on:
10 Nov 2017 02:47 pm
Published on:
10 Nov 2017 02:46 pm

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