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यूपी की 92 प्रतिशत बेटियां हैं कुपोषण की शिकार

सूबे में 92 प्रतिशत से अधिक किशोरियां खून की कमी का सामना कर रही हैं।

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लखनऊ. उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने और किशोरियों के सशक्तिकरण एक सरकारी दावों के बीच एक तस्वीर चिंता की लकीर खींचने वाली भी है। सूबे में 92 प्रतिशत से अधिक किशोरियां खून की कमी का सामना कर रही हैं। इन किशोरियों की उम्र 11 वर्ष से 18 वर्ष के बीच है। जानकर मानते हैं कि किशोरावस्था एक ऐसी अवस्था है जिसमें शारीरिक, मानसिक व हार्मोनल विकास बहुत तेजी से होता है।

92.3 प्रतिशत किशोरियों में खून की कमी

उत्तर प्रदेश में किशोरियों में सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्या खून की कमी है। उत्तर प्रदेश में लगभग 92.3 प्रतिशत किशोरियां खून की कमी से ग्रस्त हैं। क्वीन मेरी अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ एसपी जैश्वार बताती हैं कि 11 से 18 वर्ष की उम्र किशोरावस्था कहलाती हैं। इस उम्र में शरीर में तेजी से परिवर्तन होते हैं और शरीर का विकास होता है। माहवारी की शुरुआत, हार्मोनल परिवर्तन इत्यादि सामने आते हैं और इसी वजह से,पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता भी इसी उम्र में अधिक होती है। खून की कमी, कम आयु में विवाह व बार बार गर्भधारण करने से युवा महिलाओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जब खून की कमी से ग्रस्त महिला एक बच्चे को जन्म देती है तो ऐसे बच्चे का कुपोषित होना निश्चित है। इसके लिए आवश्यक है कि किशोरावस्था में ही खून की कमी को दूर किया जाये ताकि भविष्य में वह एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सके।

11 से 18 वर्ष की किशोरियां ज्यादा मिली एनिमिक

किशोरियों में अशिक्षा, गंदगी, जानकारी का अभाव, कम उम्र में शादी, जन्म के समय वजन कम होना जैसे कई कारण हैं जो कुपोषण के कारण बनते हैं। किशोरावस्था में कुपोषण से बचाव के तरीकों पर डॉ एसपी जैश्वार बताती हैं कि किशोरियों में मासिक स्त्राव में रक्त हानि हो जाती है जिसके कारण उनमे खून की कमी होने लगती है। किशोरावस्था के दौरान एनीमिया एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए उन्हें आयरन फोलिक, कैल्शियम और पौष्टिक आहार लेना चाहिए जिसमे दालें, हरी सब्जिया, गाज़र, गोभी, दूध, दही, तथा मौसमी फल आदि शामिल है। कुपोषण की समस्या सबसे अधिक 11 से 18 वर्ष की किशोरियों में देखने को मिली है। इस समस्या ने पोषाहार वितरण कार्यक्रमों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं और कार्यक्रमों को सक्रिय करने के साथ ही जागरूकता कार्यक्रमों के प्रसार की जरूरत को भी उजागर किया है।

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