
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी (फोटो पत्रिका नेटवर्क)
Gulab Kothari on Women Education: पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने कहा कि यह मानना सही नहीं है कि स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में हम आगे बढ़ रहे हैं। स्कूल-कॉलेजों में लड़कों और लड़कियों को एक जैसा पाठ्यक्रम पढ़ाया जा रहा है, जबकि स्त्री शिक्षा का उद्देश्य केवल समान शिक्षा देना नहीं, बल्कि बालिकाओं को उनकी विशिष्ट भूमिका के अनुरूप तैयार करना भी होना चाहिए। जब तक बालिकाओं को उनकी भूमिका का प्रशिक्षण नहीं मिलेगा, तब तक स्त्री शिक्षा के प्रसार के दावे अधूरे रहेंगे। विडंबना यह है कि जिस नारी को समाज को शक्ति देने वाली माना गया है, आज वही सशक्तीकरण की मांग कर रही है।
कोठारी शनिवार को अपने उत्तरप्रदेश प्रवास के दौरान लखनऊ के नेशनल पीजी कॉलेज में ‘स्त्री देह से आगे’ विषय पर आयोजित विवेचन कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पुरुषार्थ और आश्रम व्यवस्था के चिंतन को हमने ठीक से समझा ही नहीं है। हमारे शास्त्र वैज्ञानिक भाव से लिखे गए हैं और उन्हें भी विज्ञान की दृष्टि से समझने की आवश्यकता है। हमारे भीतर एक ही ईश्वर विद्यमान है, यही मूल ज्ञान है। उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में किताबों से भावनात्मकता और संवेदनशीलता का पक्ष लगभग गायब हो गया है, जबकि मां का पहला गुण ही संवेदनशीलता है।
बालिका के व्यक्तित्व और उसकी भूमिका को समझे बिना केवल लड़के और लड़की को समान पाठ्यक्रम पढ़ाना शिक्षा की पूर्णता नहीं हो सकती। इससे पूर्व कॉलेज प्राचार्य देवेन्द्र कुमार सिंह कोठारी का स्वागत किया। सिंह ने अपने संबोधन में संस्थान द्वारा महिला सशक्तिकरण के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। कार्यक्रम का संचालन पत्रिका के डिप्टी एडिटर हरीश पाराशर ने किया।
विवाह जैसे संस्कार की चर्चा करते हुए कोठारी ने कहा कि भारतीय परंपरा में विवाह शरीर का नहीं, आत्मा का संबंध है। इस भाव को नहीं समझने के कारण ही विवाह के दूसरे रूप सामने आने लगे हैं। दो आत्माओं के मिलन का भाव भी वैज्ञानिक है। विवाह के बाद स्त्री की यात्रा आत्मा के स्तर पर शुरू होती है। उन्होंने कहा कि संतान के जन्म के संदर्भ में भी हमारी प्रार्थना यही रही है कि घर में अच्छी आत्मा आए। मां की शक्ति ही ऐसी है कि वह आने वाली आत्मा को पहचानती है और उसके संस्कार निर्माण की जिम्मेदारी निभाती है।
कोठारी ने कहा कि बालिकाओं में प्रारंभ से ही मातृत्व का भाव मौजूद होता है, जबकि बालकों में यह भाव धीरे-धीरे विकसित होता है। सृष्टि की इस स्वाभाविक भिन्नता को समझना जरूरी है। उन्होंने कहा कि समाज में लड़कों की कमियों को अक्सर स्वीकार कर लिया जाता है, लेकिन लड़कियों के मामले में अधिक सतर्कता बरती जाती है। इसका एक कारण यह भी है कि परिवार के मन में यह भाव रहता है कि लड़की को दूसरे घर जाना है। उन्होंने कहा कि पति और पत्नी जब मिलकर एक इकाई बनते हैं, तभी परिवार और समाज का संतुलन कायम होता है।
कोठारी ने कहा कि मानव शरीर में स्त्री और पुरुष दोनों तत्व मौजूद हैं, लेकिन केवल यह कह देना कि दोनों आधे-आधे हैं, पूरी बात नहीं है। एक पक्ष सोम है तो दूसरा अग्नि। इन दोनों तत्वों की प्रकृति और संतुलन को समझना जरूरी है। दुर्भाग्य से वर्तमान शिक्षा पाठ्यक्रम में इन पहलुओं का उल्लेख लगभग नहीं है। शिक्षा में इस व्यापक दृष्टि का समावेश किए बिना स्त्री-पुरुष संबंधों और स्त्री की भूमिका को पूरी तरह समझना संभव नहीं है।
Updated on:
22 Aug 2026 04:56 pm
Published on:
22 Aug 2026 04:56 pm
