16 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

हिंदी दिवस- उत्तर प्रदेश की इन विभूतियों ने बढ़ाई हिंदी की शान

हिंदी को महान साहित्यकार और कवि देने में यूपी का अहम योगदान है।

7 min read
Google source verification

image

Juhi Mishra

Sep 14, 2015

hindi

hindi

लखनऊ। 14 सितंबर को पूरे देश में हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिंदी देश में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। इसका साहित्य भी काफी विशाल है। हिंदी को महान साहित्यकार और कवि देने में यूपी का अहम योगदान है। बात चाहे उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की हो या फिर राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त की, ये सभी यूपी की मिट्टी में ही जन्मे हैं। हिंदी दिवस के मौके पर उन साहित्यकारों और कवियों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनकी जड़े यूपी से जुड़ी हुई हैं।

मुंशी प्रेमचंद
मुंशी प्रेमचंद को हिंदी साहित्य के इतिहास में उपन्यास सम्राट के रूप में जाना जाता है। उनके उपन्यास और कहानियां आम आदमी और देश भक्ति से जुड़ी हुई होती थी। प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी से लगभग चार मील दूर लमही गांव में हुआ था। उनके पिता अजायब राय श्रीवास्तव डाकमुंशी थे। प्रेमचंद जब केवल 8वीं क्लास में थे, तभी उनकी माता का निधन हो गया था।
माता के निधन के दो साल बाद प्रेमचंद के पिता ने दूसरी शादी कर ली। 15 साल की उम्र में प्रेमचंद की शादी कर दी गई, लेकिन कुछ ही समय बाद उनका रिश्ता टूट गया। साल 1905 में उन्होंने विधवा शिवरानी से शादी भी कर ली। प्रेमचंद वकील बनना चाहते थे. लेकिन गरीबी की वजह से यह संभव नहीं हो सका। उन्होंने इलाहाबाद यूनिवसिज़्टी से अंग्रेज़ी साहित्य, पर्सियन और इतिहास विषयों से ग्रेजुएशन सेकेंड डिवीजन में पास की।

प्रेमचंद की साहित्य में दिलचस्पी शुरू से ही थी। उन्होंने 13 साल की उम्र से ही उपन्यास लिखना शुरू कर दिया था। उनके अंदर समाज के गरीब और शोषित वर्ग के लोगों के लिए बहुत पीड़ा थी। यही वजह थी कि उनकी कहानी का ज्यादातर पात्र गांव का कोई गरीब व्यक्ति ही होता था। प्रेमचंद ने कई कहानियां लिखी हैं। उनके 21 कहानी संग्रह में 300 के लगभग कहानियां प्रकाशित हुए हैं। इनमें शोजे -वतन, सप्त सरोज, नमक का दारोगा, प्रेम
पचीसी, प्रेम प्रसून, पूस की रात आदि मुख्य हैं। इसके अलावा उन्होंने वरदान, प्रतिज्ञा, सेवा-सदन, प्रेमाश्रम, निमज़्ला, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कमज़्भूमि, गोदान, मनोरमा उपन्यास भी लिखे। 8 अक्टूबर 1936 को 56 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

महादेवी वर्मा
महादेवी वमाज़् का जन्म यूपी के फरुखज़बाद जिले में 26 मार्च 1907 में हुआ था। उन्हें आधुनिक युग की मीरा भी कहा जाता है। कहा जाता है कि इनके घर में सात पीढिय़ों के बाद किसी लड़की का जन्म हुआ था। इसलिए घरवालों ने इनका नाम महादेवी रखा था। वे 1929 में बौद्ध दीक्षा लेकर भिक्षुणी बनना चाहती थीं, लेकिन महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद समाज-सेवा में लग गईं। 1932 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से संस्कृत में एमए किया। 11 सितंबर 1987 को इलाहाबाद में निधन हो गया।
महादेवी प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रिंसिपल और कुलपति भी रही। उन्होंने 1955 में इलाहाबाद में साहित्यकार संसद की स्थापना की। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और उनकी आथिज़्क आत्म निर्भरता के लिए बहुत काम किया। वे मराठी मिश्रित हिंदी बोलती थी।

महादेवी वर्मा की मुख्य कविताएं अधिकार, अलि! मैं कण-कण को जान चली, अलि अब सपने की बात , अश्रु यह पानी नहीं है उत्तर, कहां रहेगी चिडिय़ा, किसी का दीप निष्ठुर हूं ,कौन तुम मेरे हृदय में, क्या जलने की रीत, क्या पूजन क्यों इन तारों को उलझाते?, जब यह दीप थके आदि हैं। इसके अलावा नीहार (1933), रश्मि (1932), नीरजा( 1933), सहह्गीत (1934), दीपशिखा (1942), यामा उनके लिखे काव्य संग्रह हैं। उन्हें 1979 में साहित्य अकादमी फेलोशिप, 1982 ज्ञानपीठ पुरस्कार, 1946 पद्मभूषण, 1988 पद्मविभूषण पुरस्कार मिला।
जयशंकर प्रसाद
जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी 1889 को वाराणसी जिले में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। उनके घर पर ही उनके लिए संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी, उर्दू के लिए टीचर नियुक्त थे। कुछ समय के बाद स्थानीय क्वीन्स कॉलेज में उनका एडमिशन कराया गया, यहां पर उन्होंने 8वीं तक पढ़ाई की।

वे जब 12 साल के थे, इसी दौरान उनके पिता का निधन हो गया था। पिता की मौत के दौ साल के अंदर ही उनकी मां भी गुजर गईं। इसके कुछ ही समय बाद उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया। इस वजह से सिर्फ 17 साल की उम्र में उन्हें घर का बोझ संभालन पड़ा। उनका ज्यादातर समय वाराणसी में बीता।

कहा जाता है कि 9 साल की उम्र में ही जयशंकर प्रसाद ने 'कलाधर उपनाम से ब्रजभाषा में एक सवैया लिखकर अपने गुरु रसमयसिद्ध को दिखाया था। उनकी शुरुआती रचनाएं ब्रजभाषा में मिलती हैं। बाद में धीरे-धीरे वे खड़ी बोली को अपनाते गए। कामायनी महाकाव्य कवि उनकी अक्षय कीर्ति का स्तंभ है। भाषा, शैली और विषय-तीनों ही की दृष्टि से यह विश्व-साहित्य का अद्वितीय ग्रन्थ है।

उन्होंने झरना, आंसू, लहर, प्रेम पथिक आदि काव्य लिखे। इसके अलावा उन्होंने स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त ध्रुवस्वामिनी, जनमेजय का नाग यज्ञ राज्यश्री, अजातशत्रु नाटक, छाया प्रतिध्वनि, आकाशदीप, आंधी इंद्रजाल कहानी संग्रह और कंकाल, तितली, इरावती जैसे उपन्यास भी लिखे। 14 जनवरी 1937 को उनकी मृत्यु हो गई।

सुभद्रा कुमारी चौहान
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म साल 1904 में इलाहाबाद के निहालपुर गांव में हुआ था। इलाहाबाद में साल 1921 के असहयोग आंदोलन के प्रभाव में पढ़ाई को बीच में ही छोड़कर सक्रिय राजनीति में भाग लेना शुरू कर दिया और कई बार जेल जाना पड़ा। शादी के बाद वे जबलपुर में बस गईं। साल 1948 में एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई।

हिंदी काव्य जगत में सुभद्रा कुमारी अकेली ऐसी कवयित्री हैं, जिनकी काव्य रचनाओं से लाखों भारतीयों में स्वतंत्रता संग्राम में अपने को समर्पित कर देने के लिए प्रेरित किया था। सालों तक उनकी 'झांसी वाली रानी थी और
वीरों का कैसा हो वसंत शीषज़्क कविताएं लोगों के दिलों में राज करती रहेंगी। उनकी भाषा सीधी, सरल तथा स्पष्ट एवं आडंबरहीन खड़ी बोली है।

प्रमुख रचनाएं
काव्य संग्रह : मुकुल और त्रिधारा।
कहानी संकलन : सीधे-सादे चित्र, बिखरे मोती और उन्मादिनी

भारतेंदु हरिश्चंद्र
आधुनिक हिंदी साहित्य में भारतेंदु हरिश्चंद्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। उनका जन्म 1850 में काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ था। उनके पिता गोपाल चंद्र एक अच्छे कवि थे। बचपन में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। घर पर रह कर उन्होंने हिंदी, मराठी, बंगला, उर्दू तथा अंग्रेज़ी का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया।

पंद्रह साल की उम्र में भारतेंदु ने साहित्य सेवा प्रारंभ कर दी थी। 18 साल में उन्होंने कवि वचन-सुधा नामक पत्र निकाला। इसमें उस समय के बड़े-बड़े विद्वानों की रचनाएं छपती थीं। उन्होंने ईश्वर भक्ति आदि प्राचीन विषयों पर कविता लिखी। वहीं, समाज सुधार, राष्ट्र प्रेम आदि नवीन विषयों को भी अपनाया। उनकी कविता श्रृंगार-रस प्रधान, भक्ति-रस प्रधान, सामाजिक समस्या प्रधान और राष्ट्र प्रेम प्रधान हैं। 1885 में अल्पायु में ही उनकी मौत हो गई

रचनाएं
भारतेंदु कृत-काव्य - ग्रंथों में दान-लीला, प्रेम तरंग, प्रेम प्रलाप, कृष्ण चरित्र आदि उनके भक्ति संबंधी काव्य हैं। सतसई श्रृंगार, होली मधु मुकुल आदि श्रृंगार-प्रधान रचनाएं हैं। भारत वीरत्व, विजय-बैजयंती सुमनांजलि आदि उनकी राष्ट्रीय कवियों के संग्रह हैं। बंदर-सभा, बकरी का विलाप, अंधेर नगरी चौपट राजा हास्य-व्यंग्य प्रधान
काव्य कृतियां हैं।

सोहन लाल द्विवेदी
सोहन लाल द्विवेदी हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि थे। उनका जन्म 22 फऱवरी साल 1906 को यूपी के फतेहपुर जिले की तहसील बिंदकी नामक स्थान पर हुआ था। आजादी के लड़ाई के दौरान उनकी देश-भक्ति और ऊर्जा से ओतप्रोत रचनाओं की काफी सराहना हुई थी।

सोहन लाल द्विवेदी काशी हिंदू यूनिवसिज़्टी से एमए, एलएलबी की डिग्री ली। आजीविका के लिए जमींदारी और बैंकिंग का काम करते रहे। 1938 से 1942 तक वे राष्ट्रीय पत्र 'दैनिक अधिकार के संपादक थे। 1969 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।

ये भी पढ़ें

image

प्रकाशित कृतियां हैं- वासवदत्ता, कुणाल पूजागीत, विषपान, युगाधार और जय गांधी। इनमें गांधीवादी विचारधारा और खादी-प्रेम की मार्मिक और हृदयग्राही अभिव्यक्ति के दशज़्न होते हैं। सोहन लाल द्विवेदी ने बच्चों के लिए भी काफी कहानियां लिखी। इनमें बांसुरी, झरना, बिगुल, बच्चों के बापू, चेतना, दूध बताशा, बाल भारती, शिशु भारती, नेहरू चाचा, सुजाता, प्रभाती आदि प्रमुख हैं।

हरिवंशराय बच्चन
हरिवंशराय बच्चन का जन्म 27 नवंबर 1907 को इलाहाबाद के पास प्रतापगढ़ जिले के एक छोटे से गांव पट्टी में हुआ था। हरिवंशराय ने 1938 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से इंग्लिश में एमए किया। वे 1952 तक इलाहाबाद

संबंधित खबरें

यूनिवर्सिटी में प्रवक्ता भी रहे। 1926 में हरिवंश राय की शादी श्यामा से हुई थी, जिनका लंबी टीबी बीमारी के बाद 1936 में निधन हो गया था। इसके बाद साल 1941 में बच्चन ने तेजी सूरी से शादी की।
हरिवंशराय बच्चन साल 1952 में पढऩे के लिए इंग्लैंड चले गए। वहां कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी साहित्य/काव्य पर शोध किया। 1955 में कैम्ब्रिज से वापस आने के बाद भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया। 1976 में सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। इससे पहले उन्हें 1969 में साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिला था। हरिवंश राय बच्चन का 18 जनवरी 2003 को मुंबई में निधन हो गया था।

हरिवंशराय बच्चन व्यक्तिवादी गीत कविता या हालावादी काव्य के अग्रणी कवि हैं। अपनी काव्य-यात्रा के आरंभिक दौर में उमर ख़ैय्याम के जीवन-दर्शन से बहुत प्रभावित रहे। उनकी प्रसिद्ध कृति मधुशाला उमर ख़ैय्याम की
रूबाइयों से प्रेरित होकर ही लिखी गई थी। मधुशाला को मंच पर अत्यधिक प्रसिद्धि मिली और बच्चन काव्य प्रेमियों के लोकप्रिय कवि बन गए।

मैथिलीशरण गुप्त
हिन्दी साहित्य में गद्य को चरम तक पहुचाने में जहां प्रेमचंद्र का विशेष योगदान माना जाता है। वहीं, पद्य और कविता में राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त को सबसे आगे माना जाता है। इनका जन्म 3 अगस्त 1886 को झांसी के
चिरगांव इलाके में हुआ था। वे अपने पिता सेठ रामचरण कनकने और माता कौशिल्या बाई की तीसरी संतान थे।

12 साल की उम्र में ही उन्होंने कविता रचना शुरू कर दी थी। ब्रजभाषा में अपनी रचनाओं को लिखने की उनकी कला ने उन्हें बहुत जल्दी प्रसिद्ध बना दिया। प्राचीन और आधुनिक समाज को ध्यान में रखकर उन्होंने कई रचनाएं
लिखीं। 1936 में गांधी जी ने ही उन्हें मैथिली काव्य–मान ग्रन्थ भेंट करते हुए राष्ट्रकवि से संबोधित किया। 12 दिसंबर 1954 को चिरगांव में राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की मृत्यु हो गई। तीन अगस्त को उनकी जयंती लोग कवि दिवस के रूप में मनाते हैं।

मैथिलीशरण गुप्त की प्रमुख रचनाएं
साकेत उनकी रचना का सर्वोच्च शिखर है, लेकिन भारत-भारती मैथिलीशरण की सबसे प्रसिद्ध रचना मानी जाती है। इस रचना में उन्होंने स्वदेश प्रेम को दर्शाते हुए वर्तमान और भावी दुर्दशा से उबरने के लिए समाधान खोजने का एक सफल प्रयोग किया है। भारतवर्ष के संक्षिप्त दर्शन की काव्यात्मक प्रस्तुति भारत-भारती निश्चित रूप से किसी शोध कार्य से कम नहीं है। साकेत, जयभारत, यशोधरा, गुरुकुल, काबा–कर्बला आदि उनकी प्रमुख रचनाएं
हैं।

कला और साहित्य के क्षेत्र में विशेष सहयोग देने वाले मैथिली शरण गुप्त को 1952 में राज्यसभा सदस्यता दी गई और 1954 में उन्हें पद्मभूषण से नवाजा गया। इसके अतिरिक्त उन्हें हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कार, साकेत पर
इन्हें मंगला प्रसाद पारितोषिक तथा साहित्य वाचस्पति की उपाधि से भी अलंकृत किया गया।

ये भी पढ़ें

image