
लखनऊ. वाकई अपना लखनऊ बहुत बदल गया है, तरक्की की राह पर लखनऊ की रफ़्तार बहुत तेज़ है। वक्त रेत की तरह मुट्ठी से सरक रहा है और इक्का, टेंगा, घोडा गाड़ी की सवारी गणेश छाप टेम्पों, ऑटो रिक्शा से होते हुए आज मेट्रो तक पहुंच गई। लखनऊ के जिस रुट पर आज मेट्रो दौड़ेगी कभी वहां सवारी के साधन के नाम पर सिर्फ इक्का व तांगा ही मिलता था। यह बात है आज़ादी के बाद से 1965 तक की। इसके बाद शहर में आए सूंड़ में आए गणेश मार्का टेम्पो जिन्होंने इक्का व तांगा को सडकों से खदेड़ दिया। सन 80 के दशक में गणेश टेम्पो की भी विदाई हुई। अब सडकों पर आधुनिक टेम्पो और ऑटो दिखने लगे थे। यह दौर भी बदलने वाला और आज से शहर में लखनऊ मेट्रो दौड़ेगी।
आइये जानते हैं लखनऊ वासियों का इक्का से मेट्रो तक का सफर
इक्का
18वीं शताब्दी में इक्का लखनऊ की सड़कों का राजा हुआ करता था। परिवहन के साधन के रूप में यह लोगों की पहली पसंद थी। इक्के में आपके बैठने के लिए एक लम्बी सी सीट होती है जिस पर कम से कम तीन आदमी आराम से बैठ सकते हैं। यह घोड़े से चलने वाला 18 के दशक का सबसे अच्छा परिवहन का साधन था।
तांगा
लखनऊ की सड़कों पर तांगा सन 1950 के आसपास दौड़ता था। अभी यह सिर्फ गांव में देखने को मिल सकता है। यह भी घोड़े से चलने वाला परिवाहन का साधन था। इसमें आपको बैठने के लिए आगे पीछे दो लम्बी लम्बी सीटें मिल जाएगी।
पालकी और डोली
शादी में दुल्हन को पालकी में बिठाकर विदा करने का रिवाज बहुत पुराना है। हालांकि पालकी अब गुजरे जमाने की बात हो गई है। आधुनिकता के इस दौर में शादी-विवाह में पालकी यानी की डोली का अता-पता नहीं है। अब पालकी की जगह कार का इस्तेमाल होता है। पालकी को अपने कंधों पर उठाकर चलने वालों को कहार कहा जाता था।
दो पहिया वाहन
आज जमाना रफ्तार का है लेकिन शाही सवारी बग्घी की बात ही अलग है। इस बग्घी में कई लोग एक साथ बैठ सकते हैं। बग्घी इतिहास को खुद में समेटे हुए है। बग्घी चलाने वाले को कोचवान बोलते हैं।
Published on:
05 Sept 2017 12:59 pm
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