
19 जनवरी 1966 को भारत को पहली महिला प्रधानमंत्री के तौर पर इंदिरा गांधी मिली। 1966 में लाल बहादुर शास्त्री जी की ताशकंद मे मृत्यु के बाद कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर गुलजारी लाल नंदा को बनाया गया था। लेकिन 13 दिन के बाद कांग्रेस पार्टी के सांसदों ने इंदिरा गांधी को देश का प्रधानमंत्री चुन लिया। उस समय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के. कामराज थे।
इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री तो बन गई लेकिन सरकार चलाने का अनुभव उनके पास बिल्कुल भी नहीं था। इंदिरा के प्रधानमंत्री बनाने के 1 साल बाद 1967 मे देश मे फिर से लोकसभा का चुनाव हुआ। इस बार भी देश मे कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन इस समय तक कई राज्य कांग्रेस के हाथ से जा चुके थे। फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर उस वक्त तक विपक्ष मे कोई इतना बड़ा चेहरा नहीं था जिसपर जनता भरोसा करती।
उस समय मोरारजी देसाई देश के उप-प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री दोनों के पद पर थे। देश मे राष्ट्रपति के चुनाव का भी दौर उस समय चल रहा था और इस रेस मे वी. वी. गिरि और नीलम संजीवा रेड्डी थे। इतने वक्त तक सरकार में रहने के बाद कही ना कही इंदिरा को राजनीति की समझ भी हो ही गई थी।
राष्ट्रपति का चुनाव वी वी गिरि ने जीता तो इधर इंदिरा ने मोरारजी देसाई से वित्त मंत्री के पद से इस्तीफा ये कह कर ले लिया कि उनके कार्यों से सरकार संतुष्ट नहीं है। अब कहीं ना कहीं इंदिरा गांधी राजनीति के सारे फैसले खुद से लेना शुरू कर चुकी थीं।
उन्होने बैंको के राष्ट्रीयकरण को लेकर एक अध्यादेश पारित किया जिसे सुप्रीम कोर्ट ने उस वक्त खारिज कर दिया था।
मोरारजी देसाई के वित्त मंत्री पद से हटने की वजह से कांग्रेस पार्टी में काफी दरारे आ चुकी थीं। पार्टी के अंदर ही आपसी मनभेद शुरू हो गए थे। कांग्रेस पार्टी के अंदर की नाराजगी समय के साथ इतनी बढ़ गई कि 12 नवंबर 1969 को उन्होंने इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी से निकाल दिया। लेकिन शायद इसी एक झटके की वजह से इंदिरा गांधी गूंगी गुड़िया से आयरन लेडी तक का सफर अकेले तय कर पाई।
लोकसभा का चुनाव 1972 मे कराने की बजाय इंदिरा गांधी ने 1971 मे ही करवा लिया और उनको इसका फायदा भी हुआ। इस चुनाव मे इंदिरा के खिलाफ 4 पार्टी महागठबंधन बनाकर खड़ी हुईं लेकिन इंदिरा ने सब को पछाड़ते हुए 352 सीटों के साथ लोकसभा का चुनाव अपने नाम किया। चुनाव के नतीजों के बाद इंदिरा की छवि पूरे देश मे एक मजबूत नेता के रूप में सामने आई।
इंदिरा गांधी के वो जबरदस्त फैसले
अब पूरे देश मे इंदिरा गांधी की लोकप्रियता काफी ज्यादा बढ़ चुकी थी। 1972 मे देश के 13 राज्यों में चुनाव हुए और हर जगह कांग्रेस की ही सरकार बनी। इंदिरा गांधी की लोकप्रियता देख कर अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा, 'हर सीट पर विपक्ष पर हजारो नेता खड़े थे लेकिन कांग्रेस की तरफ से सिर्फ एक चेहरा था वो था "इंदिरा गाँधी" का'।
इंदिरा गांधी ने उस वक्त भारत के संविधान के अनुच्छेद 24 से अनुच्छेद 31 तक लगातार परिवर्तन किए। 1974 मे राष्ट्रपति का चुनाव होना था और पूरा बहुमत इंदिरा के पास था। चुनाव के लिए जिनका नाम सामने आया उनमे थे बाबू जगजीवन राम और सरदार स्वर्ण सिंह लेकिन अंत मे इंदिरा गांधी को अपने अनुसार एक तीसरा नाम मिला जो था फखरुद्दीन अली अहमद। कांग्रेस की तरफ से फखरुद्दीन अली अहमद चुनाव मे खड़े हुए और चुनाव जीत गए।
उस वक्त गुजरात की विधानसभा भंग थी इसलिए वहां की जनता ने इसका विरोध किया कि हमारा हक बनता है कि हम भी राष्ट्रपति चुनाव मे हिस्सा ले। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट मे पहुंचा कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने यह फैसला लिया कि अगर राष्ट्रपति चुनाव के समय किसी राज्य की विधानसभा भंग रहती है तो भी राष्ट्रपति चुनाव नहीं टाला जाएगा।
जब इंदिरा गांधी ने लगाया पूरे देश मे आपातकाल
उस वक्त तक हर तरफ सिर्फ और सिर्फ इंदिरा गांधी के ही चर्चे थे। सारे फैसले लगभग इंदिरा के ही पक्ष मे आ रहे थे लेकिन 25 जून 1975 को कुछ ऐसा हुआ जो अब तक के इतिहास मे पहले कभी नहीं हुआ था।
इस दिन सुबह सुबह जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा के खिलाफ रैली निकाली जिसमे लोगों का जन सैलाब उमड़ पड़ा। जिसको देख कर इंदिरा गांधी ने शाम मे मीटिंग बुलवाई और कुछ समाधान निकालने को कहा। तभी सिद्धांत शंकर राय ने कहा कि अनुच्छेद 352 का प्रयोग करके पूरे देश मे Internal Emergency लगा दीजिए।
इन्दिरा गांधी ने तुरंत इमरजेंसी ऑर्डर लिखवाया और रात मे ही उसे राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के पास हस्ताक्षर करने को भेज दिया। सुबह होते होते पूरे देश मे आपातकाल को घोषणा हो गई। विपक्ष मे जितने भी बड़े नेता थे, सब को नजरबंद करवा दिया गया।
सुबह इन्दिरा गांधी ने अपने लोगों के साथ मीटिंग किया जिसमें उन्होंने कहा कि MISA ( Maintenance of Internal Security Act) के तहत गिरफ्तारी हुई है। उस दिन संजय गांधी ने इन्द्र कुमार गुजराल को सूचना प्रसारण मंत्री से हटाकर विद्या चरण शुक्ला को सूचना प्रसारण मंत्री बना दिया। इस तरह पूरा का पूरा सूचना मंत्रालय भी इंदिरा के हाथों में आ गया।
ऐसे ही हालात पूरे देश मे 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 यानी कि 21 महीने तक रही। इसे आज भी भारत में लोग काले दिन के तौर पर याद करते है।
Updated on:
19 Jan 2023 01:01 pm
Published on:
19 Jan 2023 11:16 am
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