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जांच में हुआ खुलासा, जनवरी के पहले से ही हो रही थी खाद्यान्न की चोरी

कार्ड धारकों का आधार नंबर बदलने के लिए 125 पूर्ति निरीक्षकों की आईडी-पासवर्ड से एनआईसी के सॉफ्टवेयर में लॉगिन किया गया था।

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जांच में हुआ खुलासा, जनवरी के पहले से ही हो रही थी खाद्यान्न की चोरी

Lucknow. जितनी ही धीमी गति से अपनों को बचाते हुए ही सही लेकिन गरीबों के खाद्यान्न में सेंध लगाकर किए गए राशन घोटाले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे हैं। वैसे-वैसे राशन घोटाले का दायरा भी बढ़ता जा रहा है। अगस्त माह की जांच में जुलाई महीने का घोटाला खुला था। इससे पहले कि महीनों की जांच अब जनवरी तक पहुंच गई है।
जनवरी में भी 50 हजार से अधिक राशन कार्ड का आधार नंबर बदलकर खाद्यान्न चुराने के साक्ष्य सामने आए हैं।

घोटाले की रकम बढ़कर करीब 75 करोड़ रुपए पहुंच गई है

जुलाई में यह 12 करोड़ रुपए का खाद्यान्न सॉफ्टवेयर में आधार नंबर बदलकर बाजार में बेचा गया था। वहीं अब जनवरी का घोटाला होने की पुष्टि के बाद इस घोटाले की रकम बढ़कर करीब 75 करोड़ रुपए पहुंच गई है। घोटाले के दायरे भले ही बढ़ रहे हों, लेकिन पूरे मामले की गहनता से जांच की जा रही है। खाद्य एवं रसद विभाग के सूत्र बताते हैं कि सॉफ्टवेयर में राशन कार्ड धारकों का आधार नंबर बदलने के लिए कम से कम 125 पूर्ति निरीक्षकों की आईडी और पासवर्ड से एनआईसी के सॉफ्टवेयर में लॉगिन किया गया था। लेकिन विभाग अब तक दो निरीक्षकों पर ही कार्रवाई कर पाया है।

अब जनवरी के पहले महीनो की जांच की जा रही है

हालांकि खाद्य आयुक्त आलोक कुमार का दावा है कि घोटाले में जो भी शामिल होंगे उन्हें बक्सा नहीं जायेगा। साथ ही उन पर एफआईआर दर्ज कराने के बाद विभागी कार्यवाही भी की जायेगी। लेकिन विभाग की ओर से की गई कार्यवाही में अब-तक बागपत के केवल एक निरीक्षक को निलंबित किया गया है और मुजफ्फरनगर के एक निरीक्षक पर विभागीय कार्रवाई शुरू की गई। साथ ही इलाहाबाद के एक निरीक्षक को निलंबित करने का दावा किया जा रहा है। वही खाद्य आयुक्त आलोक कुमार ने बताया कि अब जनवरी के पहले महीनो की जांच की जा रही है।

एनआईसी नहीं दे पाई आईडी ऐड्रेस
खाद्य रसद विभाग ने अपने घोटालेबाज पूर्ति निरक्षकों को पकडऩे के लिए एनआईसी में उन कंप्यूटर का आईपी (इंटरनेट प्रोटोकोल) एड्रेस मांगा था जिनके जरिये यह चोरी की गई है, लेकिन एनआईसी ने इसके लिए हाथ खड़े कर दिए हैं। खाद्य आयुक्त आलोक कुमार ने बताया है कि अब तक एनआईसी के सॉफ्टवेयर में किसी बदलाव को करने वाले कंप्यूटर का आईपी एड्रेस दर्ज कराने की व्यवस्था ही नहीं थी। इसलिए यह जानकारी नहीं मिल पाई।