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मुश्किलों का सफर, छह घंटे होती रहती है धुक-धुक

मुश्किलों का सफर, है यह कैसा सफर...

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लखनऊ

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Dikshant Sharma

Jan 04, 2018

expressway

patrika abhiyan

लखनऊ. करीब 47 बरस पहले एक फिल्म आई थी, नाम था सफर। इस फिल्म में किशोर कुमार की आवाज में एक गीत था, जिसके बोल थे- जिन्दगी का सफऱ, है ये कैसा सफऱ.... कोई समझा नहीं, कोई जाना नहीं...। आज के दौर में यह फिल्मी गीत लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे पर सटीक बैठता है। इस हाई-वे के सफर पर मुश्किलें तमाम हैं और खतरे बेशुमार। सफर में सुविधाओं के अकाल के बीच सरकार टोल टैक्स वसूलने की जल्दबाजी में है, लेकिन सफर के दौरान किसी जरूरत पर मदद मिलना नामुमकिन है। चोर-लुटेरों का खौफ भी सताता है। 302 किलोमीटर लंबे सफर में खुले में शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है तो भूख लगने पर मंजिल का इंतजार करना जरूरी है। रफ्तार के दौरान वाहन पंचर हो जाए और स्टेपनी साथ देने से इंकार करे तो टायर बर्बाद होना तय है। कुल मिलाकर यूं समझिए कि मुश्किलों का सफर, है यह कैसा सफर...

नए सफर में वक्त घटा, लेकिन मुश्किलें बढ़ीं
लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस-वे से रोज़ाना 11 हज़ार से अधिक गाडिय़ां गुजरती हैं। समय बचाने के लिए अधिकतर लोग 302 किलोमीटर के इस रुट को पसंद करते हैं। बीते साल लखनऊ से दिल्ली पहुँचने में 10 घंटे का समय लगता था, लेकिन इस सफर पर यह वक्त छह घंटे में सिमट गया है। बावजूद एक्सप्रेस-वे का सफर है जोखिम वाला। इसी कारण कई लोग खुद और अपने परिचय वालों को इस रुट पर सफर न करने की हिदायत देते हैं। दरअसल ऐसा अनुभव है।

सावधान एक्सप्रेसवे को जानवर भी करते हैं पास !
रिटायर्ड इंजीनियर 65 वर्षीय दुर्लभ कुमार बताते हैं कि 3 नवंबर को देर रात दिल्ली उनके किसी रिलेटिव की तबियत अचानक बिगड़ गई। वे 4 नवंबर को सुबह पांच बजे ड्राइवर के साथ दिल्ली के लिए रवाना हुए। उन्होंने अभी कुछ समय एक्सप्रेसवे पर सफर किया ही था कि अचानक रोड के किनारे से झुंड में जानवर सडक़ पर आ गए। एक्सप्रेसवे पर होने के कारण गाडी 100 की स्पीड से अधिक थी। ब्रेक मारने और गाडी काटने के बावजूद गाडी संभली नहीं और डिवाइडर से टकरा गई। यात्रियों को ज़्यादा चोट तो नहीं आई लेकिन गाडी बुरी तरह डैमेज हो गई। उतर कर देखा तो हाईवे के किनारे लगे कांटे दार तार को गाँव वालों ने काट दिया था। उनका तर्क था कि अंडरपास न होने की स्थिति में एक छोर से दूसरी ओर जाने के लिए ऐसा किया है।

पंचर गाडी को तब तक चलाया जब तक नहीं फटा टायर
27 वर्षीय क्षितिज शुक्ला ने बताया कि एक पल उन्हें अफ़सोस हुआ कि वे इस एक्सप्रेसवे से क्यों आये। वे बताते हैं कि 1 दिसंबर को उनकी बहन का जन्मदिन था। वे उन्हें दिल्ली से लेकर लखनऊ आ रहे थे। व? आगरा ?? से थोड़ा आगे बड़े ही थे तो उन्हें लगा गाडी पंचर हो गई है। उतर कर देखा तो लेफ्ट साइड के दोनों टायर पंचर थे। एक्सप्रेसवे पर दूर तक अन्धेरा था। उन्होंने कहा कि अखबारों में लूट की कई घटनाओं के बारे में पढ़ा था इसलिए उन्होंने पंचर गाडी से आगे बढ़ते रहना बेहतर समझा। शिखवाबाद में रहने वाले एक मित्र को फ़ोन किया। रात के 10 बज रहे थे इसलिए वे आगे कट पर पंचर वाले को लेकर पहुंचा। पता चला कि करीब एक घंटे पंचर गाडी चलाने के चलते रिम टेढ़ा हो चुका है। हारकर उन्होंने गाडी वहाँ मौजूद पेट्रोल पम्प पर खड़ी कर मित्र की गाडी से लखनऊ का सफर तय किया।

माता जी को खुले में होना पड़ा शर्मिंदा
विशाखा कहती हैं कि वह अपनी मदर इन लॉ के साथ दिल्ली जा रहीं थी। उनकी माताजी को डायबिटीज है जिसका इलाज दिल्ली के एक निजी अस्पताल में चल रहा है। वह चेकअप के लिए आमतौर से फ्लाइट या ट्रेन से ही जाती हैं लेकिन किसी कारणवश उन्होंने सडक़ से यात्रा करने का फैसला किया। उन्हें क्या पता था कि एक्सप्रेस वे का सफर उनकी माता जी के लिए कष्टदाई होगा। डायबिटीज के चलते उनकी माता जी को कई बार शौच जाना पड़ता है। लेकिन पूरे रास्ते सिर्फ कन्नौज में ही एक यूटिलिटी सेंटर पर उन्हें शौचालय मिला। इसके अलावा 302 किलोमीटर के सफर के दौरान खुले में शर्मिंदा होना पड़ा। आज के बाद वह एक्सप्रेस वे पर तब तक सफर नहीं करेंगे जब तक वहां यूटिलिटी सेंटर नहीं बन जाते। उन्होंने इस की नाराजगी अपने सोशल मीडिया पर भी जताई थी